2013 Muzaffarnagar Riots वर्ष 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों से जुड़े एक महत्वपूर्ण कानूनी घटनाक्रम में, स्थानीय अदालत ने 25 आरोपियों के खिलाफ दर्ज मुकदमों को वापस लेने की अनुमति दी गई है। विशेष एमपी-एमएलए कोर्ट के मजिस्ट्रेट देवेंद्र सिंह फौजदार ने शासन के आदेश और अभियोजन पक्ष द्वारा दायर प्रार्थना पत्र को स्वीकार कर लिया है। इस निर्णय से केंद्रीय मंत्री डॉ. संजीव बालियान, पूर्व मंत्री सुरेश राणा और सांसद हरेंद्र मलिक सहित कई बड़े नेताओं को बड़ी राहत मिली है।
क्या था पूरा मामला?
अगस्त 2013 में कवाल (मुजफ्फरनगर) में सचिन और गौरव की हत्या के बाद जिले का माहौल तनावपूर्ण हो गया था। इस घटना के विरोध में 31 अगस्त 2013 को नगला मंदौड़ में एक शोक सभा (महापंचायत) आयोजित की गई थी। इस सभा के दौरान पुलिस ने सरकारी कार्य में बाधा डालने, रास्ता रोकने और ‘7 क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट एक्ट’ की धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया था। आरोप था कि सभा के दौरान निषेधाज्ञा का उल्लंघन किया गया और कानून-व्यवस्था की स्थिति को प्रभावित किया गया।

किन प्रमुख नेताओं को मिली राहत?
इस मामले में पुलिस ने अलग-अलग समय पर कई आरोपपत्र दाखिल किए थे। कानूनी राहत पाने वाले प्रमुख नामों में शामिल हैं:
- डॉ. संजीव बालियान: पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री
- सुरेश राणा: पूर्व मंत्री
- हरेंद्र मलिक: वर्तमान सांसद (सपा)
- कपिल देव अग्रवाल: राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार)
- भारतेंद्र सिंह: पूर्व सांसद
- उमेश मलिक: पूर्व विधायक
- स्वामी यति नरसिंहानंद: (दीपक त्यागी)
- अन्य: साध्वी प्राची, बिट्टू सिखेड़ा, अशोक कटारिया, सोहनवीर सिंह और अशोक कंसल आदि।
इस मामले में नामजद कुछ आरोपियों, जैसे पूर्व ब्लॉक प्रमुख वीरेंद्र कुतुबपुर का निधन हो चुका है, जबकि कुछ अन्य की पत्रावलियाँ समय के साथ अलग कर दी गई थीं।
शासन की अनुमति और अदालती प्रक्रिया
दशकों से लंबित इन मुकदमों को वापस लेने के लिए शासन ने पहले अपनी सैद्धांतिक सहमति दी थी। इसके बाद जिला प्रशासन (डीएम) के माध्यम से अभियोजन अधिकारी ने अदालत में अर्जी दाखिल की। अदालत ने दोनों ही मामलों—पुलिस द्वारा दर्ज रिपोर्ट और निजी परिवाद—में मुकदमों को वापस लेने के प्रार्थना पत्र को मंजूर कर लिया है।
विशेष एमपी-एमएलए कोर्ट के मजिस्ट्रेट देवेंद्र सिंह फौजदार ने कानून और प्रक्रियात्मक पहलुओं पर विचार करने के बाद अभियोजन के अनुरोध को उचित मानते हुए इसे स्वीकार कर लिया। इन मुकदमों के वापस होने के बाद लंबे समय से चल रही कानूनी तलवार अब इन नेताओं के सिर से हट गई है।
अदालती निर्णय का महत्व
मुजफ्फरनगर दंगों से जुड़े ये मुकदमे पिछले 11 वर्षों से न्यायिक प्रक्रिया में थे। राजनीतिक हलकों में इस फैसले को एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। मुकदमों की वापसी के बाद अब संबंधित नेताओं को भविष्य में इन मामलों की सुनवाई के लिए बार-बार अदालत के चक्कर नहीं काटने होंगे।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि शासन स्तर पर मुकदमों की वापसी का निर्णय राज्य की शांति और सामाजिक सौहार्द की दिशा में लिया गया एक कदम है, जिसे अदालती प्रक्रिया के माध्यम से कानूनी जामा पहनाया गया है।
रिपोर्ट- दीपक वत्स/ सोनू सिंह @Nation27
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