लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश जल निगम में वर्ष 2013 में नियुक्त किए गए 73 सामान्य वर्ग के जूनियर इंजीनियरों को बड़ी राहत दी है। अदालत ने उनकी सेवाएं समाप्त करने के आदेश को रद्द करते हुए साफ किया कि अधिकारियों की गलती या प्रशासनिक चूक का खामियाजा उन कर्मचारियों को नहीं भुगताया जा सकता, जिनकी नियुक्ति विधिवत चयन प्रक्रिया के तहत हुई हो और जिनके खिलाफ किसी तरह की धोखाधड़ी या फर्जीवाड़े का आरोप न हो।
न्यायमूर्ति इरशाद अली की एकल पीठ ने राकेश प्रताप सिंह सहित अन्य जूनियर इंजीनियरों की ओर से दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह अहम फैसला सुनाया। अदालत ने उत्तर प्रदेश राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की ओर से 28 जनवरी 2014 को जारी आदेश को भी अधिकार क्षेत्र से बाहर बताते हुए निरस्त कर दिया।
2013 में हुई थी 470 जूनियर इंजीनियरों की भर्ती
मामला उत्तर प्रदेश जल निगम में वर्ष 2013 में हुई 470 जूनियर इंजीनियरों की भर्ती से जुड़ा है। भर्ती प्रक्रिया पूरी होने के बाद आरक्षित वर्ग के कुछ अभ्यर्थियों की नियुक्ति को लेकर विवाद खड़ा हो गया था। मामले की पड़ताल और समाधान के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया गया।
समिति ने अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया था कि अतिरिक्त आरक्षित अभ्यर्थियों को भविष्य में होने वाली रिक्तियों में समायोजित किया जाए। समिति ने यह भी स्पष्ट किया था कि सामान्य वर्ग के चयनित अभ्यर्थियों की सेवाएं समाप्त नहीं की जानी चाहिए।
इसके बावजूद बाद में 136 अतिरिक्त ओबीसी और एससी अभ्यर्थियों को नियुक्त कर लिया गया। इससे 470 स्वीकृत पदों के मुकाबले नियुक्तियों की कुल संख्या बढ़कर 543 हो गई। अतिरिक्त नियुक्तियों के चलते 73 सामान्य वर्ग के जूनियर इंजीनियरों की सेवाएं समाप्त कर दी गईं।
‘अधिकारियों की गलती की सजा कर्मचारियों को नहीं’
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान इस बात पर खास जोर दिया कि अगर किसी भर्ती प्रक्रिया में प्रशासनिक स्तर पर गलती हुई है तो उसे सुधारने की जिम्मेदारी संबंधित प्राधिकरण की है। नियमित चयन प्रक्रिया के जरिए नियुक्त किए गए कर्मचारियों को केवल इसलिए नौकरी से बाहर नहीं किया जा सकता कि बाद में आरक्षण या पदों की संख्या को लेकर कोई विसंगति सामने आई।
अदालत ने माना कि आरक्षण व्यवस्था का पालन करना कानूनन जरूरी है, लेकिन आरक्षण से संबंधित किसी त्रुटि को ठीक करने के लिए पहले से नियमित रूप से नियुक्त कर्मचारियों की सेवा समाप्त करना उचित नहीं होगा।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि नियुक्ति के समय यदि अभ्यर्थियों ने किसी तरह का फर्जीवाड़ा, धोखाधड़ी या गलत तथ्य प्रस्तुत नहीं किए हैं और उनका चयन निर्धारित प्रक्रिया के तहत हुआ है, तो बाद में सामने आई प्रशासनिक खामी के आधार पर उनकी नियुक्ति को स्वतः शून्य नहीं माना जा सकता।
73 परिवारों को मिली बड़ी राहत
हाईकोर्ट के इस फैसले से 73 जूनियर इंजीनियरों और उनके परिवारों को बड़ी राहत मिली है। वर्षों से नौकरी और सेवा संबंधी विवाद का सामना कर रहे इन कर्मचारियों के लिए अदालत का फैसला एक अहम न्यायिक राहत माना जा रहा है।
इस फैसले का व्यापक महत्व इसलिए भी है क्योंकि अदालत ने यह सिद्धांत दोहराया है कि प्रशासनिक गलती को सुधारने के नाम पर किसी निर्दोष कर्मचारी के वैध रोजगार अधिकार को मनमाने तरीके से खत्म नहीं किया जा सकता।
फैसले से यह संदेश भी गया है कि भर्ती प्रक्रिया में यदि कोई त्रुटि अधिकारियों की ओर से हुई है और चयनित अभ्यर्थी उसमें किसी धोखाधड़ी के भागीदार नहीं हैं, तो उस गलती का बोझ सीधे उनके ऊपर डालना न्यायसंगत नहीं होगा।
आरक्षण व्यवस्था और नियुक्तियों से जुड़े विवादों के बीच हाईकोर्ट का यह फैसला आने वाले समय में ऐसे मामलों के लिए भी एक महत्वपूर्ण नज़ीर के तौर पर देखा जा सकता है।
रिपोर्ट- फ़रमान अब्बास मन्जुल, लखनऊ


