नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने नाबालिग से विवाह और उसके बाद यौन संबंध से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ किया कि किसी नाबालिग लड़की का विवाह मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत हुआ हो, तब भी इससे 18 साल से कम उम्र की लड़की के साथ यौन संबंध बनाने पर POCSO एक्ट के तहत आपराधिक जिम्मेदारी खत्म नहीं होती। अदालत ने कहा कि व्यक्तिगत कानून बच्चों को यौन अपराधों से बचाने वाले कानून की सुरक्षा को कमजोर नहीं कर सकता। यह टिप्पणी जस्टिस संजीव नरूला की पीठ ने 23 सितंबर 2026 के फैसले में की। मामला 28 वर्षीय व्यक्ति से जुड़ा था, जिसने करीब 16 साल 3 महीने की लड़की से शादी की थी। आरोपी ने अपने खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने की मांग की थी, लेकिन हाई कोर्ट ने इसमें हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
मामले के अनुसार, लड़की की शादी उस समय हुई जब उसकी उम्र करीब 16 साल 3 महीने थी। शादी के बाद दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने और लड़की गर्भवती हुई। बाद में मामले में POCSO समेत अन्य कानूनी प्रावधानों के तहत कार्रवाई शुरू हुई। आरोपी की ओर से अदालत में यह दलील दी गई कि विवाह मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार हुआ था और दोनों साथ रह रहे थे। इसलिए उसके खिलाफ दर्ज FIR को रद्द किया जाना चाहिए। कोर्ट ने हालांकि इस तर्क को आपराधिक जिम्मेदारी से बचने का आधार नहीं माना।
हाई कोर्ट ने मामले में एक अहम अंतर स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि किसी विवाह की नागरिक या व्यक्तिगत कानून के तहत वैधता और नाबालिग के साथ यौन संबंध बनाने से पैदा होने वाली आपराधिक जिम्मेदारी, दोनों अलग-अलग कानूनी सवाल हैं। यानी अगर किसी व्यक्तिगत कानून के तहत विवाह को वैध माना जाता है, तो भी इसका मतलब यह नहीं है कि 18 साल से कम उम्र की लड़की के साथ यौन संबंध बनाने पर POCSO की धाराएं लागू नहीं होंगी। कोर्ट ने कहा कि बच्चे की सुरक्षा से जुड़े आपराधिक कानून को व्यक्तिगत कानून के आधार पर निष्प्रभावी नहीं किया जा सकता।
अदालत ने POCSO एक्ट की उस व्यवस्था का हवाला दिया, जिसके तहत 18 वर्ष से कम उम्र के व्यक्ति को बच्चा माना गया है। कोर्ट के मुताबिक, इस कानून के तहत नाबालिग के साथ यौन कृत्य को अपराध के दायरे में रखा गया है और बच्चे की कथित सहमति इसे वैध नहीं बनाती। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि POCSO में नाबालिग के साथ यौन संबंध के मामलों में ‘सहमति’ को वयस्कों की तरह कानूनी बचाव के तौर पर नहीं देखा जा सकता। यानी 18 साल से कम उम्र होने की स्थिति में केवल यह कहना कि लड़की अपनी इच्छा से संबंध में थी, आरोपी को POCSO के तहत जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता।
फैसले में कोर्ट ने बेहद साफ शब्दों में यह सिद्धांत रखा कि विवाह किसी बच्चे की उम्र नहीं बढ़ा देता। अगर कोई लड़की शादी के समय 16 साल की थी, तो शादी के बाद भी उसकी उम्र 16 साल ही रहेगी। शादी का होना उसे कानूनी तौर पर 18 साल का नहीं बना देता। इसी आधार पर अदालत ने कहा कि नाबालिग के साथ यौन संबंध के मामले में विवाह को POCSO के खिलाफ सुरक्षा कवच के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने POCSO के साथ-साथ भारतीय न्याय संहिता (BNS) के प्रावधानों पर भी गौर किया। अदालत के सामने यह सवाल भी था कि 18 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ यौन संबंध को आपराधिक कानून किस तरह देखता है। फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि नाबालिग पत्नी के मामले में वैवाहिक अपवाद को इस तरह नहीं पढ़ा जा सकता कि 18 साल से कम उम्र की लड़की के साथ यौन संबंध पूरी तरह आपराधिक कानून से बाहर हो जाए। इस तरह अदालत ने नाबालिगों की सुरक्षा से जुड़े कानूनों को व्यक्तिगत कानून के साथ टकराव की स्थिति में अलग कानूनी ढांचे के तौर पर देखा।
आरोपी ने हाई कोर्ट से अपने खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने की मांग की थी। अदालत ने तथ्यों और लागू कानूनी प्रावधानों पर विचार करने के बाद इस मांग को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने माना कि घटना के समय लड़की 18 साल से कम उम्र की थी और इसलिए POCSO का कानूनी ढांचा लागू होता है। अदालत ने इसी आधार पर FIR को रद्द करने से इनकार कर दिया। इस फैसले का मुख्य बिंदु यही है कि व्यक्तिगत कानून के तहत विवाह को मान्यता मिलने का सवाल और नाबालिग के साथ यौन संबंध की आपराधिकता का सवाल अलग हैं। दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि POCSO का उद्देश्य बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देना है और इस सुरक्षा को व्यक्तिगत कानून के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता।
कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण है, जहां नाबालिग से विवाह के बाद आरोपी यह तर्क देता है कि विवाह वैध होने के कारण यौन संबंध को अपराध नहीं माना जाना चाहिए। अदालत ने इस मामले में ऐसा बचाव स्वीकार नहीं किया। फैसले में यह भी साफ किया गया कि अदालत को मामले में मौजूद कानूनी प्रावधानों के आधार पर FIR रद्द करने की मांग पर विचार करना था। चूंकि घटना के समय लड़की नाबालिग थी और POCSO के प्रावधान लागू होते थे, इसलिए आरोपी को इस स्तर पर राहत नहीं दी गई।
























