उत्तर प्रदेश में अपराध और अपराधियों पर कार्रवाई एक बार फिर चर्चा में है। पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक, मार्च 2017 से अब तक यानी बीते नौ वर्षों में प्रदेश में पुलिस मुठभेड़ों के दौरान 303 अपराधी मारे गए हैं। सरकार इसे अपराधियों के खिलाफ “जीरो टॉलरेंस” नीति का परिणाम बताती है। योगी आदित्यनाथ सरकार के सत्ता में आने के बाद से ही कानून-व्यवस्था को सबसे बड़ी प्राथमिकता बताया गया। सरकार का कहना है कि पहले प्रदेश में संगठित अपराध, रंगदारी और माफिया का बोलबाला था, जिससे आम लोग, व्यापारी और किसान डरे रहते थे। अब हालात बदले हैं और लोग पहले से ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं।
पुलिस अधिकारियों का तर्क है कि ज्यादातर मुठभेड़ें तब हुईं, जब अपराधियों ने गिरफ्तारी से बचने के लिए पुलिस टीम पर गोली चलाई। जवाबी कार्रवाई में वे मारे गए। पुलिस के अनुसार इन कार्रवाइयों में कई जवान भी घायल हुए हैं और कुछ ने अपनी जान भी गंवाई है। सरकार केवल मुठभेड़ों को ही अपनी उपलब्धि नहीं बताती। उसके मुताबिक अपराधियों की अवैध संपत्तियों पर बुलडोजर और कुर्की की कार्रवाई हुई, गैंगस्टर एक्ट के तहत मामले दर्ज किए गए और बड़ी संख्या में वांछित अपराधियों को गिरफ्तार किया गया। साथ ही पुलिस ने कई इनामी बदमाशों की धरपकड़ भी की है। सरकार का कहना है कि इन सभी कदमों का मकसद अपराधियों के मन में कानून का डर बैठाना है।
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कई लोगों का मानना हैं कि पहले की तुलना में प्रदेश के कई क्षेत्रों में आना-जाना आसान हुआ है और बाजारों में दुकानदार ज्यादा बेफिक्र होकर काम करते हैं। खासकर महिलाओं की सुरक्षा को लेकर भी कई लोग बेहतर माहौल की बात करते हैं। मानवाधिकार संगठन और विपक्षी दल पुलिस मुठभेड़ों पर सवाल उठाते रहे हैं। उनका कहना है कि सजा देने का अधिकार अदालतों के पास है, पुलिस के पास नहीं है। कुछ मामलों में परिजनों ने मुठभेड़ को फर्जी बताया है और निष्पक्ष जांच की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी समय-समय पर मुठभेड़ों की जांच के लिए तय प्रक्रिया का पालन करने पर जोर देते रहे हैं। इसमें एफआईआर दर्ज करना और स्वतंत्र जांच कराना शामिल है। सरकार का कहना है कि सभी मामलों में नियमों के तहत जांच होती है।
रिपोर्ट- सोनू सिंह
























