उत्तर प्रदेश की राजनीति में विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर नए समीकरणों की आहट सुनाई देने लगी है। अपनी जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रदेश के पूर्व कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा से मुलाकात की है। इस भेंट की तस्वीरें मौर्य ने खुद सोशल मीडिया मंच एक्स पर साझा कीं। इसके बाद लखनऊ से दिल्ली तक सियासी गलियारों में चर्चा तेज हो गई। एक तस्वीर में मौर्य, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और वायनाड की सांसद प्रियंका गांधी के साथ दिख रहे हैं। दूसरी तस्वीर में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम भी उनके साथ हैं। तस्वीरें भले सादी हों, उनके मायने गहरे माने जा रहे हैं।
स्वामी प्रसाद मौर्य और अखिलेश यादव का रिश्ता किसी से छिपा नहीं है। 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले मौर्य भारतीय जनता पार्टी छोड़कर समाजवादी पार्टी में आए थे। चुनाव के बाद हालात बदले। उन्होंने सपा से दूरी बना ली और अपनी अलग पार्टी खड़ी कर ली। अब वही नेता कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के साथ नजर आ रहे हैं, तो सपा खेमे में बेचैनी स्वाभाविक है। मुलाकात का समय भी अहम है। लोकसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। अखिलेश यादव और उनकी पार्टी बार-बार कह रही है कि पुराना गठबंधन ही आगे भी कायम रहेगा। फिर भी सीटों के बंटवारे और भूमिकाओं को लेकर तस्वीर अभी साफ नहीं है। ऐसे में कांग्रेस का दूसरे दलों और नेताओं से संवाद बढ़ाना इस बात का संकेत भी माना जा सकता है कि पार्टी अपने विकल्प खुले रखना चाहती है।
हाल के दिनों में कांग्रेस की सक्रियता और भी दिखी है। लोकदल के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी सुनील सिंह ने भी दिल्ली में राहुल गांधी से मुलाकात की थी। इससे पहले वे लखनऊ आकर अखिलेश यादव से भी मिल चुके थे। यानी विपक्षी खेमे में नए साथियों को जोड़ने की कोशिशें अलग-अलग स्तर पर चल रही हैं। मौर्य लंबे समय से पिछड़े वर्ग की राजनीति का एक जाना-पहचाना चेहरा रहे हैं। समाजवादी पार्टी ने पिछड़ों और अति पिछड़ों के सहारे ही 2022 में अपनी सीटें बढ़ाई थीं। उस चुनाव में भाजपा को 255 और सपा को 111 सीटें मिली थीं। 2027 की लड़ाई के लिए अखिलेश को अपने सामाजिक आधार को और मजबूत करना होगा। ऐसे में किसी पुराने सहयोगी का कांग्रेस के करीब जाना उनके लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है।
हालांकि तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। अभी यह साफ नहीं है कि मौर्य की पार्टी कांग्रेस के साथ गठबंधन करेगी, किसी बड़े मोर्चे का हिस्सा बनेगी या यह सिर्फ शिष्टाचार भेंट थी। न किसी औपचारिक घोषणा की सूचना है, न बातचीत के ब्योरे सार्वजनिक हुए हैं। मौर्य के चुनावी असर को लेकर भी राजनीतिक हलकों में अलग-अलग राय है। कुछ लोग उन्हें असरदार नेता मानते हैं, तो कुछ का कहना है कि अकेले दम पर वे बड़ा फर्क नहीं डाल पाएंगे।उत्तर प्रदेश की सियासत में हर मुलाकात के मायने निकाले जाते हैं, और यह मुलाकात भी उसी कड़ी में है। इतना तय है कि चुनाव नजदीक आते-आते गठबंधन, सीट बंटवारे और सामाजिक समीकरणों की खींचतान और तेज होगी। अब नजर इस पर रहेगी कि अखिलेश यादव इस घटनाक्रम पर क्या रुख अपनाते हैं और कांग्रेस आने वाले दिनों में कौन-सा पत्ता खोलती है। जनता की निगाहें भी इसी पर टिकी हैं कि 2027 का मुकाबला किन खेमों के बीच होगा।
रिपोर्ट- सोनू सिंह


























