आश्विन मास की शुरुआत के साथ ही घर-घर में भक्ति का माहौल बनने लगा है। रविवार, 11 अक्टूबर 2026 से शारदीय नवरात्र का आरंभ हो रहा है। नौ दिनों तक चलने वाले इस पर्व में मां दुर्गा के अलग-अलग रूपों की पूजा होती है। पहले दिन देवी के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री का पूजन किया जाता है। इसी दिन श्रद्धालु कलश स्थापित कर अगले नौ दिनों के व्रत और साधना का संकल्प लेते हैं। नवरात्र में कलश स्थापना को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है, इसलिए इसे शुभ समय में ही करना चाहिए। प्रातःकाल का मुहूर्त: सुबह 6:31 बजे से 10:27 बजे तक अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:01 बजे से 12:49 बजे तक अपने शहर के अनुसार समय में थोड़ा अंतर हो सकता है, इसलिए स्थानीय पंचांग या अपने पंडित जी से एक बार पुष्टि कर लेना अच्छा रहता है।
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र पहनें। फिर पूजा की जगह को अच्छी तरह साफ करें और मन ही मन मां दुर्गा तथा मां शैलपुत्री का स्मरण करें। सबसे पहले मिट्टी के किसी पात्र में मिट्टी भरकर उसमें जौ बो दें। इसके बाद तांबे या मिट्टी के कलश में जल भरें और उसमें थोड़ा गंगाजल मिलाएं। कलश में अक्षत, सुपारी और एक सिक्का डालें। मुख पर आम या अशोक के पत्ते सजाएं और उन पर नारियल रखें। नारियल को लाल कपड़े या कलावे से लपेट दें तो और भी शुभ माना जाता है। अब हाथ में जल लेकर घटस्थापना और नौ दिन के व्रत का संकल्प करें। घी का दीपक और धूप जलाएं। मां शैलपुत्री को सफेद फूल, अक्षत, कुमकुम और ऋतुफल अर्पित करें। इसके बाद मंत्रों का जाप करें, भोग लगाएं और अंत में श्रद्धा से आरती करें। पूजा के दौरान इस बीज मंत्र का जाप किया जाता है, ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः ध्यान के लिए यह श्लोक भी पढ़ा जाता है, वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम् वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
मां शैलपुत्री को गाय के घी से बनी चीजें प्रिय मानी जाती हैं। इसलिए इस दिन घी या उससे बना हलवा चढ़ाना शुभ समझा जाता है। मान्यता है कि इससे आरोग्य और सुख-समृद्धि मिलती है। पौराणिक कथा के अनुसार, मां शैलपुत्री अपने पूर्व जन्म में प्रजापति दक्ष की पुत्री सती थीं और उनका विवाह भगवान शिव से हुआ था। एक बार दक्ष ने विशाल यज्ञ कराया, जिसमें उन्होंने सभी देवताओं को बुलाया, पर शिव जी को निमंत्रण नहीं दिया। सती बिना बुलाए ही पिता के घर पहुंच गईं। वहां उन्होंने अपने पति के प्रति अपमान भरी बातें सुनीं, जिन्हें वे सह नहीं सकीं और उन्होंने यज्ञ की अग्नि में स्वयं को समर्पित कर दिया। अगले जन्म में उन्होंने पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया। पर्वत की पुत्री होने के कारण वे शैलपुत्री कहलाईं। उन्हें पार्वती और हेमवती नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने कठोर तप करके फिर से भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया।
मां शैलपुत्री के एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में कमल है, और उनका वाहन वृषभ यानी बैल है। माना जाता है कि वे मूलाधार चक्र की अधिष्ठात्री हैं, इसलिए साधना की शुरुआत उन्हीं की आराधना से होती है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि उनकी उपासना से जीवन में स्थिरता, साहस, धैर्य और मानसिक शांति आती है। इस नवरात्र पहले दिन पूरे मन और शुद्ध भाव से पूजा करें, तो आने वाले आठ दिनों की साधना भी सहज और फलदायी होती है।
























