आज 12 अक्टूबर को शारदीय नवरात्र का दूसरा दिन है। इस दिन मां दुर्गा के दूसरे स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी की उपासना की जाती है। “ब्रह्म” का अर्थ तपस्या है और “चारिणी” का अर्थ आचरण करने वाली, यानी तप का पालन करने वाली देवी। मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन से इनकी आराधना करता है, उसके भीतर धैर्य, संयम और आत्मविश्वास बढ़ता है। कठिन परिस्थितियों में भी उसका मन विचलित नहीं होता।
शास्त्रों में मां का रूप अत्यंत सौम्य और तेजस्वी बताया गया है। वे श्वेत वस्त्र धारण करती हैं। उनके दाहिने हाथ में जपमाला और बाएं हाथ में कमंडल है। नंगे पांव चलने वाला यह रूप साधना और वैराग्य का प्रतीक माना जाता है। ज्योतिष की मान्यताओं में इनकी पूजा को मंगल ग्रह से जुड़े दोषों की शांति के लिए भी शुभ कहा जाता है। पूजा के लिए सुबह ब्रह्म मुहूर्त और उसके बाद का समय उत्तम माना जाता है। दिन के अन्य शुभ काल, जैसे अभिजित मुहूर्त, स्थान के अनुसार कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकते हैं। इसलिए सटीक समय के लिए अपने शहर का स्थानीय पंचांग या अपने पंडित जी की सलाह देख लेना बेहतर रहेगा।
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ, हो सके तो सफेद या हल्के रंग के वस्त्र पहनें। पूजा स्थल को गंगाजल से पवित्र करें। कलश और अखंड ज्योति को प्रणाम करने के बाद मां ब्रह्मचारिणी का ध्यान करें। मां को अक्षत, रोली, चंदन और सफेद फूल अर्पित करें। कहा जाता है कि उन्हें गुड़हल और कमल के फूल भी प्रिय हैं। इसके बाद धूप-दीप जलाकर आरती करें और दुर्गा सप्तशती या दुर्गा चालीसा का पाठ करें। अंत में परिवार के साथ प्रसाद बांटें। मां को शक्कर और पंचामृत का भोग लगाने की परंपरा है। मान्यता है कि इससे परिवार के सदस्यों की आयु बढ़ती है और घर में सुख-शांति बनी रहती है। कई घरों में मिश्री, फल और दूध से बनी मिठाइयां भी चढ़ाई जाती हैं। मां का ध्यान करते हुए इस मंत्र का जाप किया जा सकता है:, ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः, श्रद्धा से 108 बार जाप करना शुभ माना जाता है। मन को एकाग्र रखना जाप का सबसे ज़रूरी हिस्सा है।
पौराणिक कथा के अनुसार, मां ने पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया। देवर्षि नारद के कहने पर उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप शुरू किया। कहा जाता है कि उन्होंने हजारों वर्षों तक केवल फल-फूल खाकर साधना की। फिर वर्षों तक सिर्फ बेलपत्र खाए और बाद में उन्होंने बेलपत्र भी त्याग दिए। निराहार रहने के कारण उनका एक नाम “अपर्णा” पड़ा। इस कठिन तपस्या से उनका शरीर क्षीण हो गया, फिर भी उनका संकल्प नहीं डिगा। उनके तप से तीनों लोक गूंज उठे। अंततः देवताओं और ऋषियों ने उनकी साधना की सराहना की और उन्हें शिव की अर्धांगिनी बनने का आशीर्वाद मिला। यह कथा सिखाती है कि लगन और धैर्य से बड़े से बड़ा लक्ष्य पाया जा सकता है। मां ब्रह्मचारिणी की उपासना हमें याद दिलाती है कि सफलता का रास्ता मेहनत और अनुशासन से होकर गुजरता है। नवरात्र के इस दूसरे दिन श्रद्धा के साथ पूजा करें और अपने भीतर संयम व सकारात्मकता को जगह दें।
























