शारदीय नवरात्र के चौथे दिन मां दुर्गा के चौथे स्वरूप मां कूष्मांडा की आराधना की जाती है। मान्यता है कि देवी अपने भक्तों के रोग और कष्ट दूर करती हैं। इस दिन श्रद्धालु माता को उनका प्रिय भोग अर्पित करते हैं और मंत्रों का जाप करते हैं। कहा जाता है कि गहरे नीले रंग के वस्त्र पहनकर पूजा करने से उसका फल कई गुना बढ़ जाता है। यदि पूजा शुभ मुहूर्त में की जाए, तो माता का आशीर्वाद परिवार पर बना रहता है। देवी दुर्गा के नौ रूपों में मां कूष्मांडा को ब्रह्मांड की रचयिता माना गया है। कथा के अनुसार, जब सृष्टि का कोई अस्तित्व नहीं था और चारों ओर केवल अंधकार था, तब माता ने अपनी दिव्य मुस्कान से ब्रह्मांड को रचा। उनके तेज से ही पूरा संसार प्रकाशित हुआ। माता की आठ भुजाएं हैं, इसलिए उन्हें अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है। उनके हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल, चक्र, गदा, जपमाला और अमृत का कलश सुशोभित रहता है। उनका वाहन सिंह है, जो साहस और शक्ति का प्रतीक है। माता का संबंध सूर्य से जोड़ा जाता है, जो प्रकाश, ऊष्मा और जीवन का स्रोत है। उनका तेजस्वी रूप उसी ऊर्जा को दर्शाता है, जो पूरे ब्रह्मांड को संचालित करती है।
चौथे दिन पूजन के लिए ये मुहूर्त उत्तम माने गए हैं, ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:54 से 05:43 बजे तक, अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:44 से दोपहर 12:30 बजे तक, विजय मुहूर्त: दोपहर 02:22 से 03:09 बजे तक, अमृत काल: दोपहर 04:14 से शाम 05:57 बजे तक, गोधूलि मुहूर्त: शाम 06:17 से 06:42 बजे तक सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। एक चौकी पर माता की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें और उनके माथे पर रोली या सिंदूर का तिलक लगाएं। यदि आपने पहले दिन कलश की स्थापना की है, तो अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार पहले कलश का पूजन करें, फिर माता के सामने दीपक जलाएं। इसके बाद माता को फूल और अक्षत अर्पित करें। भोग में मालपुआ या कोई अन्य मिठाई रखें। फिर मंत्रों का जाप करें और कथा का पाठ करें। यदि संभव हो तो दुर्गा सप्तशती का पाठ भी अत्यंत शुभ माना जाता है। पूजा के अंत में आरती करें और परिवार की शांति, स्वास्थ्य तथा समृद्धि की प्रार्थना करें। अंत में सभी सदस्यों में प्रसाद बांटें।
इस दिन “ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः” मंत्र का जाप करना बहुत फलदायी माना जाता है। अपनी सुविधा के अनुसार इसे 11, 21, 51 या 108 बार दोहराया जा सकता है। मान्यता है कि इससे घर के रोग-दोष दूर होते हैं और माता की कृपा प्राप्त होती है। माता को कुम्हड़ा, यानी पेठा या कद्दू से बनी मिठाई चढ़ाना सबसे शुभ माना गया है। इसके अलावा केसरिया हलवा या कोई भी पीली मिठाई अर्पित की जा सकती है। मालपुए का भोग भी शुभ फल देने वाला है। कथा के अनुसार, सृष्टि से पहले चारों ओर घना अंधकार फैला था। तब मां कूष्मांडा ने मुस्कुराकर ब्रह्मांड की रचना की और अपने तेज से उसमें प्रकाश भर दिया। इसी कारण उन्हें आदिशक्ति और सृष्टि की रचनाकार कहा जाता है। उनके हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल, अमृत कलश, चक्र, गदा और जपमाला होती है। जपमाला सिद्धि और आध्यात्मिक शक्ति की प्रतीक मानी जाती है। माता को कुम्हड़ा अत्यंत प्रिय है, इसी वजह से उनका नाम कूष्मांडा पड़ा।
























