शारदीय नवरात्र का सातवां दिन मां दुर्गा के सबसे शक्तिशाली स्वरूप मां कालरात्रि को समर्पित है। वैदिक पंचांग के अनुसार, आज 17 अक्टूबर को भक्त श्रद्धा के साथ देवी की पूजा करेंगे और कई श्रद्धालु उनकी कृपा पाने के लिए व्रत भी रखेंगे। मान्यता है कि नवरात्र में सच्चे मन से मां कालरात्रि की आराधना करने पर जीवन से नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं। भक्तों को हर तरह के डर से राहत मिलती है और मन में साहस व शांति का संचार होता है। इसी कारण सप्तमी का यह दिन बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।
पूजा-पाठ के लिए आज के तीन समय विशेष बताए गए हैं:, ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:59 बजे से 5:47 बजे तक, अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:43 बजे से दोपहर 12:38 बजे तक, संध्या पूजा मुहूर्त: दोपहर 3:54 बजे से शाम 6:14 बजे तक। आप अपनी सुविधा के अनुसार इनमें से किसी भी समय पूजा कर सकते हैं। सबसे पहले सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। इसके बाद मां कालरात्रि की प्रतिमा या तस्वीर का अभिषेक करें और उन्हें वस्त्र अर्पित करें। देवी को कुमकुम, लाल चंदन और फूल चढ़ाएं। फिर देसी घी का दीपक जलाएं। इसके बाद पूरे मन से आरती करें, व्रत कथा पढ़ें और मंत्रों का जाप करें। भोग में गुड़ की खीर और मौसमी फल रखें। पूजा के अंत में देवी से परिवार की सुख-शांति की प्रार्थना करें और प्रसाद सभी में बांटकर स्वयं भी ग्रहण करें।
मां कालरात्रि को गुड़ बेहद पसंद है। इसलिए सप्तमी के दिन गुड़ या उससे बनी मिठाइयों का भोग लगाना शुभ माना जाता है। कहा जाता है कि इससे देवी जल्दी प्रसन्न होती हैं और भक्तों पर अपनी कृपा बरसाती हैं। कथा के अनुसार, एक समय शुंभ, निशुंभ और रक्तबीज नाम के दैत्यों ने तीनों लोकों में आतंक फैला दिया था। उनके अत्याचार से देवता बहुत परेशान हो गए और उन्होंने देवी दुर्गा की स्तुति की। साथ ही वे समाधान के लिए भगवान शिव के पास भी पहुंचे। तब शिव जी ने माता पार्वती से दैत्यों का अंत करने को कहा। माता पार्वती ने दुर्गा का रूप धारण किया और शुंभ-निशुंभ का संहार किया।
असली चुनौती रक्तबीज था। उसे वरदान मिला था कि उसके रक्त की एक भी बूंद धरती पर गिरते ही उसी के समान एक नया राक्षस पैदा हो जाएगा। इस वजह से उसे हराना लगभग असंभव हो गया था। तब मां दुर्गा ने अपने तेज से कालरात्रि का भयंकर रूप प्रकट किया। उन्होंने रक्तबीज का रक्त धरती पर गिरने से पहले ही अपने मुख में समा लिया और इस तरह उसका अंत कर दिया। यही कथा बताती है कि जब बुराई बहुत बढ़ जाती है, तब शक्ति अपने सबसे उग्र रूप में प्रकट होकर उसे समाप्त करती है। मां कालरात्रि की उपासना भक्तों को यही विश्वास देती है कि अंधकार कितना भी गहरा हो, उसका अंत निश्चित है।
























