उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले विधान परिषद के चुनावों को सेमीफाइनल के तौर पर देखा जा रहा है। विधान परिषद चुनावों के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं मैदान में उतर चुके हैं। पार्टी सूत्रों के अनुसार, इन चुनावों में किसी भी तरह की चूक से बचने के लिए उन्होंने पूरी कमान अपने हाथ में ले ली है। सरकार और संगठन, दोनों स्तरों पर इसकी तैयारियां साफ दिखाई देने लगी हैं।
विधान परिषद चुनाव को इतनी गंभीरता से लेने की एक बड़ी वजह साफ है, कि इन चुनावों के नतीजे सीधे तौर पर विधानसभा चुनावों को प्रभावित कर सकते हैं। यही कारण है कि इन्हें विधानसभा चुनाव से पहले का सेमीफाइनल भी कहा जा रहा है। जैसे फाइनल से पहले सेमीफाइनल जीतना टीम का आत्मविश्वास बढ़ाता है, वैसे ही परिषद चुनाव की जीत पार्टी को नई ऊर्जा दे सकती है। अगर नतीजे पक्ष में आते हैं, तो कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ेगा और जनता के बीच भी सकारात्मक संदेश जाएगा। इसके उलट, प्रतिकूल परिणाम विपक्ष को हमलावर होने का मौका दे सकते हैं। राजनीति में धारणा की बड़ी भूमिका होती है, और एक छोटी हार भी बड़े मुद्दे की तरह पेश की जा सकती है। शायद इसीलिए नेतृत्व इस मोर्चे पर कोई जोखिम नहीं उठाना चाहता।
मुख्यमंत्री ने चुनावी तैयारियों की निगरानी खुद शुरू कर दी है। वे संगठन के पदाधिकारियों और वरिष्ठ नेताओं के साथ लगातार संवाद कर रहे हैं। प्रत्याशियों के चयन से लेकर जमीनी रणनीति तक, हर पहलू पर बारीकी से नजर रखी जा रही है। बताया जा रहा है कि उनका जोर इस बात पर है कि सभी कार्यकर्ता आपसी तालमेल के साथ काम करें और मतदाताओं तक सरकार की उपलब्धियां प्रभावी ढंग से पहुंचाएं। आपसी खींचतान या असंतोष की गुंजाइश न रहे, इस पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। विधान परिषद के चुनाव आम चुनावों से काफी अलग होते हैं। इनमें मतदाता सीमित होते हैं, जैसे विधायक, स्थानीय निकायों के प्रतिनिधि, स्नातक और शिक्षक। मतदाताओं की संख्या कम होने से हर एक वोट की कीमत बढ़ जाती है। ऐसे में छोटी सी चूक भी भारी पड़ सकती है और जीत-हार का फासला बहुत कम रह सकता है। यही वजह है कि पार्टी नेतृत्व हर वोट को सहेजने की रणनीति पर काम कर रहा है।
संगठन के स्तर पर भी कसावट दिखाई दे रही है। बूथ स्तर तक रणनीति बनाई जा रही है और जिम्मेदारियां तय की जा रही हैं। कार्यकर्ताओं को साफ संदेश दिया गया है कि चुनाव को हल्के में न लिया जाए और हर स्तर पर पूरी सक्रियता दिखाई जाए। जानकारों का कहना है कि जब शीर्ष नेतृत्व खुद मैदान में हो, तो नीचे तक काम करने वालों में भी जिम्मेदारी का भाव बढ़ जाता है। दूसरी ओर, विपक्षी दल भी चुप नहीं बैठे हैं। वे भी अपनी रणनीति को धार देने में जुटे हैं और सत्ता पक्ष को घेरने का कोई मौका छोड़ना नहीं चाहते। चूंकि विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, इसलिए हर पार्टी इस चुनाव को अपनी ताकत परखने के अवसर के रूप में देख रही है। आने वाले दिनों में राजनीतिक बयानबाजी और जोड़-तोड़ की चर्चाएं और तेज होने की उम्मीद है।
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कुल मिलाकर, विधान परिषद चुनाव सिर्फ कुछ सीटों की लड़ाई भर नहीं रह गए हैं। इनके जरिए राजनीतिक दल अपनी पकड़, संगठन की मजबूती और जनता के मूड का अंदाजा लगाना चाहते हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का खुद कमान संभालना बताता है कि भाजपा इन चुनावों को कितनी अहमियत दे रही है। अब देखना यह होगा कि मुख्यमंत्री की यह सक्रियता चुनावी नतीजों में कितना रंग लाती है और आगामी विधानसभा चुनाव की दिशा किस ओर तय होती है। फिलहाल इतना तय है कि प्रदेश की सियासत में आने वाले दिन काफी दिलचस्प रहने वाले हैं।
























