Dussehra 2026: आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि पर हर साल दशहरा का पर्व मनाया जाता है। पंचांग के अनुसार इस वर्ष यह त्योहार 20 अक्टूबर को मनाया जा रहा है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण का वध कर माता सीता को उसकी कैद से मुक्त कराया था। इसी उपलक्ष्य में देश के कोने-कोने में रावण दहन का आयोजन होता है। रावण दहन से जुड़ी एक खास बात यह है कि इसके लिए शुभ मुहूर्त का विशेष ध्यान रखा जाता है। परंपरा के अनुसार यह काम प्रदोष काल में करना सबसे श्रेष्ठ माना गया है। लेकिन ऐसा क्यों है, यह बहुत से लोग नहीं जानते। आइए इसके पीछे की मान्यता को समझते हैं। सूर्यास्त के आसपास का समय प्रदोष काल कहलाता है। यह वह घड़ी होती है, जब दिन ढल रहा होता है और रात दस्तक दे रही होती है। दिन और रात के इसी मिलन-बिंदु को प्रदोष काल कहते हैं। इसे गोधूलि बेला के साथ भी जोड़कर देखा जाता है। सनातन परंपरा में संधि का यह समय बेहद महत्वपूर्ण माना गया है।
ज्योतिष शास्त्र की मानें तो इस समय शुरू किया गया कोई भी शुभ कार्य सफलता की ओर ले जाता है। यही कारण है कि दशहरा पर रावण दहन के लिए इसी समय को चुना जाता है। हिंदू धर्म में प्रदोष काल और गोधूलि बेला को नकारात्मक और आसुरी शक्तियों का प्रभाव समाप्त करने के लिए सबसे उपयुक्त बताया गया है। रावण को अहंकार, अन्याय और बुराई का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में जब उसके पुतले को इस विशेष घड़ी में अग्नि को समर्पित किया जाता है, तो यह केवल एक रस्म नहीं रह जाती। यह इस संदेश का प्रतीक बन जाती है कि जिस तरह रात के अंधेरे से पहले दिन की रोशनी विदा लेती है, उसी तरह बुराई का अंत भी निश्चित है।
दशहरा हमें याद दिलाता है कि सत्य और मर्यादा की राह भले कठिन हो, जीत अंत में उसी की होती है। रावण परम ज्ञानी और बलशाली था, फिर भी अहंकार और अधर्म ने उसका पतन कर दिया। प्रदोष काल में रावण दहन इसी सीख को दोहराने का तरीका है। जलते पुतले के साथ लोग अपने भीतर की बुराइयों, जैसे क्रोध, लोभ और घमंड को त्यागने का संकल्प भी लेते हैं। इस समय रावण दहन का एक व्यावहारिक पक्ष भी है। शाम के समय लोग काम से निवृत्त होकर परिवार के साथ मैदानों और मेलों में जुटते हैं। सूर्यास्त के बाद की रोशनी में जलता पुतला और आतिशबाजी का नजारा भी अलग ही माहौल बनाता है। इस तरह यह परंपरा आस्था के साथ-साथ सामूहिक उत्सव का रूप ले लेती है। प्रदोष काल में रावण दहन की परंपरा धार्मिक मान्यता, ज्योतिषीय विश्वास और सामाजिक उत्साह, तीनों का सुंदर मेल है। इस बार दशहरे पर जब आप रावण दहन देखें, तो उसके पीछे छिपे इस संदेश को याद रखें कि अंधकार कितना भी गहरा हो, प्रकाश की विजय तय है।























