ताजिकिस्तान की राजधानी दुशान्बे में मंगलवार को शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शासनाध्यक्षों की परिषद की बैठक हुई। इस मंच से रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने आतंकवाद पर भारत का रुख एक बार फिर साफ शब्दों में रखा। खास बात यह रही कि जब वे यह बात कह रहे थे, तब पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री इशाक डार भी बैठक में मौजूद थे। राजनाथ सिंह ने सदस्य देशों के प्रतिनिधियों से कहा कि आतंकवाद आज भी शांति और विकास के लिए सबसे गंभीर खतरों में गिना जाता है। उनके मुताबिक इसका नुकसान सिर्फ बेकसूर लोगों की जान जाने तक सीमित नहीं है। यह निवेश और व्यापार की राह में भी रुकावट बनता है। उन्होंने यह भी कहा कि आतंकवाद समाज में कट्टरता को बढ़ावा देता है और युवाओं से वे अवसर छीन लेता है, जिन पर उनका हक है।
रक्षा मंत्री ने जोर देकर कहा कि आतंकवाद को किसी भी कारण या तर्क से उचित नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने साफ किया कि इससे निपटने में दोहरे मापदंड नहीं चलेंगे। उनके शब्दों का सार यह था कि जो लोग आतंकियों को पैसा देते हैं, उनका साथ देते हैं या उन्हें सुरक्षित ठिकाना मुहैया कराते हैं, उनके लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय में कोई जगह नहीं होनी चाहिए। साथ ही उन्होंने कहा कि आतंकवाद के पूरे नेटवर्क को सामूहिक और मजबूत प्रयासों से जड़ से मिटाना जरूरी है। यह बयान इसलिए अहम माना जा रहा है कि एससीओ में क्षेत्रीय सुरक्षा और आतंकवाद-रोधी सहयोग हमेशा से प्रमुख विषय रहे हैं। ऐसे में भारत ने इस मंच का इस्तेमाल अपनी चिंता सीधे और बिना लाग-लपेट के रखने के लिए किया।
इससे पहले 15 अक्तूबर को भी राजनाथ सिंह सीमा पार आतंकवाद पर भारत की नीति दोहरा चुके हैं। तब उन्होंने कहा था कि अगर पाकिस्तान की ओर से आगे कोई आतंकी गतिविधि होती है, तो उसका जवाब और भी कड़ा होगा। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि भारत की सांस्कृतिक परंपरा संवाद, सह-अस्तित्व और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान में भरोसा रखती है। लेकिन उनका संदेश स्पष्ट था कि शांति के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को उसकी कमजोरी न समझा जाए। दुशान्बे में दिया गया ताजा बयान उसी सिलसिले की कड़ी माना जा रहा है। इसमें भारत ने एक ओर बातचीत और शांति की अपनी परंपरा को रेखांकित किया, तो दूसरी ओर आतंकवाद के मुद्दे पर किसी तरह की नरमी से इनकार किया। बैठक के दौरान राजनाथ सिंह ने द्विपक्षीय मुलाकातें भी कीं। उन्होंने ताजिकिस्तान के प्रधानमंत्री कोहिर रसूलजोदा और ईरान के प्रथम उपराष्ट्रपति मोहम्मद रजा आरिफ से भेंट की। इन मुलाकातों के बारे में रक्षा मंत्री ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर जानकारी साझा की। उन्होंने लिखा कि बैठक की शुरुआत में ताजिकिस्तान के प्रधानमंत्री से मिलकर उन्हें खुशी हुई। उन्होंने बताया कि बातचीत में भारत और ताजिकिस्तान के बीच लंबे समय से चले आ रहे सांस्कृतिक रिश्तों और दोनों देशों के लोगों के बीच गहरे जुड़ाव पर खास तौर पर जोर दिया गया।
कूटनीतिक नजरिए से देखें तो एससीओ जैसे बहुपक्षीय मंच पर इस तरह की बात रखना भारत की स्थायी नीति को दिखाता है। भारत लंबे समय से कहता आया है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई तभी कामयाब होगी, जब सभी देश बिना किसी भेदभाव के एकजुट होकर कदम उठाएं। आतंकियों की फंडिंग रोकना और उन्हें पनाह देने वाले ठिकानों को खत्म करना इसी रणनीति का हिस्सा है। राजनाथ सिंह के संबोधन का सबसे अहम हिस्सा यही था कि आतंकवाद से लड़ाई में चुनिंदा रवैया नहीं अपनाया जा सकता। जब तक आतंकियों को मदद, पैसा और सुरक्षित जगह मिलती रहेगी, तब तक शांति और विकास की कोशिशें अधूरी रहेंगी। भारत ने इसी बात को सदस्य देशों के सामने रखा और उनसे सामूहिक जिम्मेदारी निभाने की अपेक्षा जताई। अब निगाहें इस पर रहेंगी कि एससीओ के सदस्य देश इस संदेश को अपनी आगे की साझा रणनीति में कितनी जगह देते हैं।
























