कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाने वाला अहोई अष्टमी का पर्व माताओं की आस्था और ममता का प्रतीक है। इस दिन माताएं पूरे दिन बिना अन्न-जल के रहकर अपने बच्चों की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुखद भविष्य के लिए अहोई माता से प्रार्थना करती हैं। उत्तर भारत में, खासकर उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान में, यह व्रत बड़ी श्रद्धा से रखा जाता है। इस साल अहोई अष्टमी 1 नवंबर 2026 को पड़ रही है। यदि आप भी यह व्रत रखने जा रही हैं, तो तिथि, मुहूर्त और पूजा के नियम पहले से जान लेना अच्छा रहेगा।

क्यों खास है अहोई अष्टमी का व्रत
मान्यता है कि इस व्रत को नियम और सच्चे मन से करने पर संतान के जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और उसे तरक्की के रास्ते मिलते हैं। पुराने समय में यह व्रत पुत्र की रक्षा के लिए रखा जाता था, लेकिन अब अधिकतर परिवारों में माताएं बेटे और बेटी, दोनों के लिए इसे समान भाव से करती हैं। जिन दंपतियों को संतान सुख की कामना होती है, वे भी अहोई माता का आशीर्वाद पाने के लिए यह व्रत रखती हैं। इस पर्व का संबंध अहोई माता और स्याहु (साही) की कथा से जोड़ा जाता है। इसीलिए पूजा में चित्र बनाने, कथा सुनने और तारों को अर्घ्य देने जैसी परंपराओं का खास महत्व माना गया है।
अहोई अष्टमी 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त
वैदिक पंचांग के अनुसार इस बार अष्टमी तिथि की शुरुआत 1 नवंबर को 2 बजकर 51 मिनट पर होगी। इसका समापन 2 नवंबर को 1 बजकर 10 मिनट पर होगा। चूंकि पूजा का समय शाम का होता है और उस वक्त अष्टमी तिथि 1 नवंबर को ही मौजूद रहेगी, इसलिए व्रत इसी दिन रखा जाएगा। व्रत की तिथि: 1 नवंबर 2026, पूजा का शुभ मुहूर्त: शाम 5:36 बजे से 6:54 बजे तक, तारे दिखने का समय: लगभग शाम 6:00 बजे, चंद्रोदय: रात 11:40 बजे, ध्यान रखें कि शहर के हिसाब से समय में कुछ मिनट का अंतर हो सकता है, इसलिए अपने स्थानीय पंचांग से एक बार मिलान जरूर कर लें।

व्रत वाले दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र पहनें। इसके बाद हाथ में जल लेकर संतान की सलामती और सुख-समृद्धि का मन में संकल्प करें। यह व्रत निर्जला रखा जाता है, यानी दिनभर न अन्न खाया जाता है और न पानी पिया जाता है। इसका समापन तारों को अर्घ्य देने के बाद होता है। परंपरा के अनुसार बीच में जल या भोजन ग्रहण करने से व्रत खंडित माना जाता है।
जो महिलाएं स्वास्थ्य कारणों से कठोर निर्जला व्रत नहीं रख सकतीं, वे अपने परिवार के बड़ों या किसी जानकार पंडित से सलाह लेकर अपनी सुविधा के अनुसार नियम तय कर सकती हैं। श्रद्धा और भावना सबसे ऊपर है, और स्वास्थ्य को नजरअंदाज करना ठीक नहीं है।
पूजा की तैयारी और विधि
शाम की पूजा से पहले पूजा स्थल की साफ-सफाई करें। परंपरा के अनुसार दीवार पर गेरू से अहोई माता का चित्र बनाया जाता है। चित्र में आमतौर पर माता के साथ स्याहु और उसके बच्चों की आकृतियां भी बनाई जाती हैं। अगर दीवार पर चित्र बनाना संभव न हो, तो बाजार में मिलने वाला अहोई माता का छपा हुआ चित्र या कैलेंडर भी लगाया जा सकता है।

शुभ मुहूर्त शुरू होने पर पूजा की चौकी सजाएं और अहोई माता का चित्र स्थापित करें। सामने जल से भरा कलश रखें। इसी जल से बाद में अर्घ्य दिया जाता है। देसी घी का दीपक जलाएं और माता को रोली, अक्षत और फूल अर्पित करें। भोग में दूध, मीठे पुए या हलवा रखें। परिवार की महिलाओं के साथ बैठकर अहोई अष्टमी की व्रत कथा सुनें या पढ़ें। कथा के बाद अहोई माता की आरती करें और संतान की सुरक्षा के लिए प्रार्थना करें। कथा का पाठ क्यों है जरूरी
लोक मान्यता है कि अहोई अष्टमी की कथा सुने बिना व्रत पूरा नहीं माना जाता। कथा में एक ऐसी महिला का प्रसंग आता है, जिससे अनजाने में एक गलती हो जाती है और उसके बाद उसे संतान संबंधी कष्ट झेलना पड़ता है। बाद में सच्चे मन से माता की आराधना करने पर उसके दुख दूर होते हैं। यह कथा सिखाती है कि जाने-अनजाने में हुई भूल के लिए क्षमा मांगना और मन से प्रायश्चित करना भी पूजा का एक अहम हिस्सा है। इसलिए कथा सुनते समय ध्यान एकाग्र रखें, अच्छा हो कि घर के बच्चे भी पास बैठकर इसे सुनें।
तारों को अर्घ्य देने की परंपरा
जिस तरह करवा चौथ पर चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है, उसी तरह अहोई अष्टमी पर तारों को अर्घ्य देने का विधान है। शाम को आसमान में तारे दिखाई देने लगें, तब कलश के जल से उन्हें अर्घ्य दें और संतान की लंबी उम्र की प्रार्थना करें। अर्घ्य देने के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है। कई परिवारों में चंद्रोदय के बाद भी अर्घ्य देने की परंपरा है। इस बार चंद्रमा रात 11:40 बजे निकलेगा, इसलिए ज्यादातर माताएं तारों के दर्शन के बाद ही व्रत खोलना पसंद करेंगी। आप अपने परिवार और क्षेत्र की मान्यता के अनुसार निर्णय ले सकती हैं।

पारण में रखें सात्विक भोजन का ध्यान
दिनभर के उपवास के बाद शरीर को हल्के और सुपाच्य भोजन की जरूरत होती है। पारण के समय सात्विक भोजन ही ग्रहण करें। सबसे पहले पूजा में चढ़ाया गया प्रसाद, यानी पुए या हलवा, खाएं। इसके बाद दाल, सब्जी, रोटी या खिचड़ी जैसा सादा भोजन लिया जा सकता है। लहसुन, प्याज और तामसिक चीजों से इस दिन परहेज करना चाहिए। व्रत खोलने के बाद थोड़ा-थोड़ा पानी पिएं, ताकि पेट पर अचानक बोझ न पड़े।
व्रत वाले दिन किसी से झगड़ा या कटु वचन से बचें और मन को शांत रखें। इस दिन मिट्टी खोदने या धारदार चीजों के इस्तेमाल से जुड़े काम से बचने की परंपरा कई घरों में निभाई जाती है, क्योंकि कथा में इसका संदर्भ आता है। पूजा में बच्चों को शामिल करें और माता का आशीर्वाद दिलाएं।
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पूजा के बाद घर के बड़ों के चरण छूकर आशीर्वाद लें। कथा और आरती पूरे ध्यान और श्रद्धा के साथ करें। निर्जला व्रत शरीर के लिए कठिन हो सकता है। अगर आप गर्भवती हैं, मधुमेह या ब्लड प्रेशर जैसी समस्या से जूझ रही हैं या किसी बीमारी का इलाज चल रहा है, तो व्रत से पहले डॉक्टर की राय जरूर ले लें। धार्मिक मान्यताओं में भी माना गया है कि स्वस्थ रहकर की गई पूजा ही सबसे फलदायी होती है। जरूरत हो तो फलाहार या जल के साथ व्रत रखने के बारे में परिवार के बुजुर्गों से सलाह ली जा सकती है।
अहोई अष्टमी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि मां और संतान के अटूट रिश्ते का उत्सव है। इस दिन की गई पूजा, कथा और प्रार्थना में सबसे जरूरी चीज है सच्ची भावना। 1 नवंबर को शाम 5:36 से 6:54 बजे के शुभ मुहूर्त में विधि-विधान से पूजा करें, तारों को अर्घ्य दें और सात्विक भोजन से व्रत खोलें। अहोई माता सभी बच्चों को स्वस्थ, सुखी और दीर्घायु बनाए रखें, यही इस पर्व की सबसे प्यारी कामना है।

























