संतान की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और खुशहाल जीवन की कामना से रखा जाने वाला अहोई अष्टमी का व्रत इस वर्ष 1 नवंबर को मनाया जा रहा है। इस दिन माताएं सूर्योदय से लेकर तारों के दर्शन तक बिना अन्न-जल के उपवास रखती हैं और शाम को अहोई माता की विधि-विधान से पूजा करती हैं।

परंपरा के अनुसार व्रत का पारण तारों को अर्घ्य देने के बाद ही किया जाता है। लेकिन कई बार मौसम साथ नहीं देता। कभी घने बादल छा जाते हैं, तो कभी धुंध और प्रदूषण के कारण आसमान धुंधला रहता है। ऐसे में व्रत रखने वाली महिलाओं के मन में स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि जब तारे दिखेंगे ही नहीं, तो अर्घ्य कैसे दें और क्या उनका व्रत पूरा माना जाएगा? आइए इसका समाधान समझते हैं।
अहोई अष्टमी व्रत का महत्व
अहोई अष्टमी को कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन अहोई माता की उपासना करने से बच्चों के जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और उन पर माता की कृपा बनी रहती है। कई परिवारों में यह व्रत केवल पुत्र के लिए नहीं, बल्कि सभी संतानों की मंगलकामना के लिए रखा जाता है। पूरे दिन निर्जला रहकर माताएं शाम को दीवार पर अहोई माता का चित्र बनाती हैं या बाजार से लाया हुआ चित्र स्थापित करती हैं। कथा सुनने और पूजन के बाद तारों के दर्शन होने पर उन्हें अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है।

तारों को अर्घ्य देने की सही विधि
तारों को अर्घ्य देने की प्रक्रिया सरल है, पर कुछ बातों का ध्यान रखना जरूरी माना गया है। शाम की पूजा पूरी होने के बाद एक लोटे में साफ जल भरें। उसमें थोड़ा कच्चा दूध, रोली, अक्षत और लाल रंग के फूल डालें। हाथ में थोड़े गेहूं या चावल के दाने और कुछ मिठाई रखें। उत्तर-पूर्व दिशा (ईशान कोण) या पूर्व दिशा की ओर मुख करके खड़ी हों।
किसी आसन या पाटे पर खड़े होकर अर्घ्य दें, ताकि जल सीधे जमीन पर न गिरे। ध्यान रहे कि अर्घ्य का जल पैरों पर न पड़े। अर्घ्य देते समय “ॐ अहोई मात्रे नमः” मंत्र का जाप करें। इसके बाद हाथ जोड़कर प्रणाम करें और मन ही मन संतान की दीर्घायु और अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना करें।
पंचांग में दिए गए समय को आधार बनाएं
हर स्थान के लिए पंचांग में तारों के उदय का समय दिया जाता है। यदि तारे दिखाई न दें, तो उसी समय पूर्व दिशा की ओर मुख करके खड़ी हों और आसमान की ओर जल अर्पित करें। अर्घ्य देते समय अहोई माता और तारों का ध्यान करें तथा संतान के कल्याण की कामना करें। अपने शहर का सटीक समय जानने के लिए स्थानीय पंचांग या किसी विश्वसनीय पंडित से जानकारी ले लेना बेहतर रहता है।
धार्मिक मान्यताओं में पूजा के दौरान भाव और श्रद्धा को विशेष महत्व दिया गया है। कहा जाता है कि माता अहोई अपने भक्तों को उनकी आस्था के अनुसार फल देती हैं। इसलिए यदि मौसम की वजह से तारे नहीं दिख रहे, तो इसे व्रत में कमी न मानें। सच्चे मन से किया गया पूजन और अर्घ्य ही सबसे महत्वपूर्ण है।

यदि आपके शहर में आसमान साफ नहीं है, लेकिन किसी अन्य शहर में तारे दिखाई दे रहे हैं, तो आप वीडियो के माध्यम से उन्हें देखकर अर्घ्य दे सकती हैं। आज के समय में वीडियो कॉल या लाइव प्रसारण से यह आसानी से संभव है। अगर आपका कोई रिश्तेदार या परिवार का सदस्य ऐसे शहर में है जहां आसमान साफ है, तो उनसे वीडियो कॉल पर तारे दिखाने को कह सकती हैं। सच्चे मन से प्रार्थना करते हुए उस तारे को देखकर अर्घ्य देने पर भी उतना ही फल मिलने की मान्यता है।
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पूजा की सामग्री पहले से तैयार रखें, ताकि ऐन वक्त पर भागदौड़ न करनी पड़े। अर्घ्य देने से पहले हाथ-पैर धोकर शुद्ध वस्त्र पहनें। अर्घ्य के जल को किसी गमले या पौधे में डालें, ताकि वह पैरों के नीचे न आए। व्रत खोलने से पहले अहोई माता की कथा अवश्य सुनें या पढ़ें। स्वास्थ्य संबंधी परेशानी हो तो अपनी क्षमता का ध्यान रखें और परिवार के बड़ों से सलाह लें। यह भी याद रखें कि अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में पूजा की परंपराएं थोड़ी भिन्न हो सकती हैं। इसलिए अपने घर की रीति और बड़ों के मार्गदर्शन को प्राथमिकता दें।
अहोई अष्टमी का मूल भाव एक माँ की अपने बच्चों के प्रति निस्वार्थ प्रार्थना है। बादल छाए हों या आसमान साफ हो, अगर पूजा श्रद्धा से की गई है, तो उसका महत्व कम नहीं होता। पंचांग के अनुसार तारों के समय अर्घ्य देना, वीडियो के जरिए तारे देखना या परिजनों के शहर के तारों को देखकर जल अर्पित करना, ये सभी उपाय आपके व्रत को पूर्ण करने में सहायक माने गए हैं। इसलिए मौसम की चिंता छोड़कर विश्वास और आस्था के साथ पूजन करें और माता से अपनी संतान के सुखद भविष्य का आशीर्वाद मांगें।
























