शारदीय नवरात्र का आठवां दिन महाअष्टमी कहलाता है। इस दिन देवी दुर्गा के आठवें स्वरूप मां महागौरी की उपासना होती है। मान्यता है कि सच्चे मन से मां की पूजा करने पर घर में सुख-शांति बनी रहती है और भक्तों की इच्छाएं पूरी होती हैं। इस साल महाअष्टमी 19 अक्टूबर 2026, सोमवार को मनाई जाएगी। पंचांग के अनुसार 19 अक्टूबर को पूजा के लिए ये समय श्रेष्ठ रहेंगे:, ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:52 से 5:40 बजे तक, अमृत काल: सुबह 7:28 से 9:16 बजे तक, संधि पूजा: सुबह 10:27 से 11:15 बजे तक, अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:43 से दोपहर 12:29 बजे तक, अष्टमी तिथि 19 अक्टूबर को सुबह समाप्त होगी। इसलिए जो भक्त तिथि के भीतर पूजा करना चाहते हैं, वे सुबह का समय चुनें।
मां महागौरी का रूप शांत, सौम्य और तेज से भरा हुआ है। ‘महा’ का अर्थ है महान और ‘गौरी’ का अर्थ है उज्ज्वल या गौर वर्ण वाली। उनका रंग दूध जैसा श्वेत माना गया है। वे सफेद वस्त्र पहनती हैं और बैल की सवारी करती हैं। मां की चार भुजाएं हैं। एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में डमरू है, जबकि बाकी दो हाथ वरद और अभय मुद्रा में हैं। उनका यह रूप पवित्रता, शांति और करुणा का प्रतीक है। सुबह स्नान के बाद साफ वस्त्र पहनें और पूजा स्थल को स्वच्छ करें। चौकी पर मां की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें और दीपक जलाएं। इसके बाद रोली, अक्षत, फूल और चुनरी अर्पित करें। मां को सफेद या गुलाबी फूल प्रिय माने जाते हैं। पूजा के बाद दुर्गा चालीसा या आरती का पाठ करें और अंत में प्रसाद बांटें।
मां महागौरी को नारियल का भोग विशेष रूप से प्रिय है। इसके अलावा हलवा, पूरी, काले चने और खीर भी चढ़ाई जाती है। अष्टमी पर यही प्रसाद कन्याओं को भी खिलाया जाता है। मां की आराधना में इस मंत्र का जाप किया जाता है:, ॐ देवी महागौर्यै नमः, श्रद्धा के साथ 108 बार जाप करना शुभ माना गया है। महाअष्टमी पर कन्या पूजन की परंपरा है। नौ कन्याओं और एक बालक को घर बुलाकर उनके पैर धोए जाते हैं, तिलक लगाया जाता है और भोजन कराया जाता है। विदाई के समय उन्हें उपहार या दक्षिणा दी जाती है। माना जाता है कि कन्याएं देवी का ही रूप हैं, इसलिए उनके सत्कार से मां प्रसन्न होती हैं। कथा के अनुसार देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। वर्षों की साधना और कठिन जीवन के कारण उनका शरीर मलिन पड़ गया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने उन्हें गंगाजल से स्नान कराया। इससे उनका रूप फिर दमक उठा और वे अत्यंत गौर वर्ण की हो गईं। तभी से वे महागौरी कहलाईं। महाअष्टमी का पर्व हमें धैर्य, तप और आस्था का संदेश देता है। श्रद्धा से की गई साधना कभी व्यर्थ नहीं जाती, यही मां महागौरी की कथा सिखाती है।
























