नई दिल्ली: देश की राजनीति में एक बार फिर बयानों की गर्मी बढ़ गई है। केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर तीखा हमला बोला है। मुख्य न्यायाधीश से मुलाकात का समय न मिलने और याचिका के जरिए अदालत का दरवाजा खटखटाने की सलाह दिए जाने के बाद चिराग ने कहा कि राहुल गांधी को आज संविधान का असली पाठ पढ़ने को मिल गया। चिराग पासवान ने अपने आधिकारिक एक्स हैंडल पर राहुल गांधी को संबोधित करते हुए एक पोस्ट साझा किया। उन्होंने लिखा कि राहुल गांधी लंबे समय से संविधान की किताब हाथ में लेकर घूमते रहे हैं, लेकिन संविधान का वास्तविक पाठ आखिरकार देश के मुख्य न्यायाधीश ने ही उन्हें पढ़ाया। चिराग ने चुटीले अंदाज में कहा, “निकले थे ज्ञापन लेकर, लौटे CJI से सबक लेकर।” उनके मुताबिक, लोकतंत्र में न्याय की राह स्पष्ट है। न्याय याचिका के माध्यम से मांगा जाता है, ज्ञापन के जरिए नहीं।
अपने पोस्ट में केंद्रीय मंत्री ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR का भी जिक्र किया। उन्होंने याद दिलाया कि इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय पहले ही अपना फैसला सुना चुका है। चिराग का सवाल था कि जब अदालत में दलीलें टिक नहीं पाईं, तो क्या अब सड़क पर उतरकर न्यायपालिका पर दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है? उन्होंने इशारों में यह भी कहा कि किसी मुद्दे पर अदालत का निर्णय आ जाने के बाद ज्ञापन और प्रदर्शन के सहारे उस पर असर डालने का प्रयास उचित नहीं ठहराया जा सकता। उनके अनुसार, संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान करना हर राजनीतिक दल और नेता की जिम्मेदारी है।
SIR को लेकर विपक्षी दल पहले से ही अपनी आपत्तियां दर्ज कराते रहे हैं। उनका कहना है कि इस प्रक्रिया से मतदाताओं के अधिकारों पर असर पड़ सकता है। दूसरी ओर, सत्ता पक्ष इसे चुनावी प्रक्रिया को पारदर्शी और त्रुटिरहित बनाने की कवायद बताता है। ऐसे माहौल में चिराग पासवान का यह हमला राजनीतिक दृष्टि से अहम माना जा रहा है, क्योंकि यह सीधे विपक्ष की रणनीति और न्यायपालिका से उसके संवाद के तरीके पर सवाल खड़ा करता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में इस बयान पर कांग्रेस की ओर से भी प्रतिक्रिया आ सकती है। फिलहाल सोशल मीडिया पर चिराग के पोस्ट को लेकर दोनों पक्षों के समर्थक अपनी-अपनी राय रख रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर इस बहस को हवा दे दी है कि राजनीतिक दलों को अदालती मामलों में किस रास्ते का चयन करना चाहिए। एक तरफ विपक्ष जनता की चिंताओं को उठाने का तर्क देता है, तो दूसरी तरफ सत्ता पक्ष का कहना है कि न्यायिक प्रक्रिया का पालन ही सही तरीका है। आने वाले समय में यह मुद्दा संसद से लेकर सड़क तक चर्चा में बना रह सकता है।
























