INDIA रैली: दीपावली से कुछ ही दिन पहले का रविवार दिल्ली के व्यापारियों के लिए सालभर की सबसे बड़ी उम्मीदों में से एक होता है। इस बार यह उम्मीद अधूरी रह गई। रामलीला मैदान में आयोजित INDIA गठबंधन की रैली को लेकर जो आशंका पहले से जताई जा रही थी, वह काफी हद तक सही साबित हुई। व्यापारियों का दावा है कि राजधानी के करीब 20 बाजारों में इसका असर दिखा और त्योहारी खरीदारी की वह चहल-पहल कहीं नजर नहीं आई, जिसका इंतजार महीनों से था।

कनॉट प्लेस पर सबसे ज्यादा मार
रैली का सबसे गहरा असर कनॉट प्लेस और उसके आसपास के बाजारों पर पड़ा। यहां के रेस्तरां और दुकानदारों के मुताबिक रात तक कारोबार बमुश्किल 40 प्रतिशत के स्तर तक ही पहुंच पाया। यानी जिन दुकानों पर आम तौर पर रविवार की शाम कदम रखने की जगह नहीं मिलती, वहां इस बार ग्राहकों का इंतजार करना पड़ा। इसकी बड़ी वजह भौगोलिक है। कनॉट प्लेस रैली स्थल के काफी नजदीक है। रैली के दिन आसपास की सड़कों पर भीड़ और यातायात की पाबंदियों का अंदेशा रहता है। ऐसे में परिवार के साथ खरीदारी करने निकलने वाले लोग अक्सर घर पर रुकना ही बेहतर समझते हैं।
स्थिति तब और बिगड़ गई जब रैली के दौरान INDIA गठबंधन के नेताओं का मार्च आउटर सर्कल से होते हुए मिंटो ब्रिज की ओर से निकला। इस मार्च के कारण कनॉट प्लेस के आसपास दिनभर अनिश्चितता और डर का माहौल बना रहा। दुकानदार यह तय नहीं कर पा रहे थे कि दुकान खुली रखें या जल्दी बंद कर दें, और ग्राहक यह नहीं जान पा रहे थे कि वहां पहुंचना आसान होगा या नहीं।

व्यापारियों का कहना है कि बाजार को नुकसान केवल भीड़ से नहीं होता, बल्कि उस माहौल से होता है जो भीड़ की खबरों से बन जाता है। जब ग्राहक के मन में यह संदेह बैठ जाए कि रास्ते बंद हो सकते हैं या लौटना मुश्किल होगा, तो वह बाजार का रुख ही नहीं करता।
कई बाजारों में सूने रहे गलियारे
कनॉट प्लेस अकेला नहीं था। पालिका बाजार, सुपर बाजार, जनपथ और पुरानी दिल्ली के चावड़ी बाजार समेत कई अन्य बाजारों में भी त्योहारी खरीदारी वैसी नहीं हो सकी, जैसी इन दिनों में होती है। इन बाजारों की पहचान ही दीपावली की सजावट, उपहारों, कपड़ों, इलेक्ट्रॉनिक सामान और घरेलू जरूरतों की खरीदारी से है। इसलिए जब सबसे व्यस्त दिन पर ग्राहक कम आए, तो दुकानदारों की चिंता बढ़ना स्वाभाविक था।
छोटे दुकानदारों और रेहड़ी-पटरी वालों के लिए यह नुकसान और भी भारी है। उनके पास बड़े शोरूम की तरह बाद में भरपाई करने की गुंजाइश नहीं होती। त्योहार के चंद दिनों की बिक्री पर ही उनका बड़ा हिस्सा निर्भर करता है।

त्योहारी सीजन की उम्मीदों पर पानी
दीपावली से पहले के सप्ताहांत को बाजार की भाषा में निर्णायक माना जाता है। दुकानदार महीनों पहले से माल का भंडारण करते हैं, अतिरिक्त कर्मचारी रखते हैं और सजावट पर खर्च करते हैं। ऐसे में एक पूरा रविवार कमजोर रह जाना केवल एक दिन का घाटा नहीं है। यह उस पूरे निवेश पर असर डालता है, जो इस सीजन के भरोसे किया गया था।
रेस्तरां कारोबारियों की स्थिति भी अलग नहीं रही। खरीदारी के बाद खाने-पीने के लिए रुकने वाले लोग उनका मुख्य ग्राहक वर्ग होते हैं। जब लोग बाजार ही नहीं पहुंचे, तो रेस्तरां की मेजें भी खाली रहीं।
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कारोबारियों का कहना है कि राजनीतिक रैलियां और प्रदर्शन लोकतंत्र का हिस्सा हैं और उन पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं। उनकी चिंता इस बात को लेकर है कि ऐसे आयोजनों के समय बाजारों के लिए कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं होती। उनका मानना है कि बड़े आयोजनों की अनुमति देते समय त्योहारी सीजन का ध्यान रखा जाना चाहिए। साथ ही प्रशासन को पहले से बताना चाहिए कि कौन-से रास्ते खुले रहेंगे, ताकि ग्राहकों में भ्रम न फैले।

दीपावली में कुछ ही दिन बचे हैं और व्यापारी उम्मीद लगाए बैठे हैं कि आने वाले दिनों में बाजारों में रौनक लौटेगी। उन्हें भरोसा है कि अगर माहौल सामान्य रहा तो त्योहार तक की बिक्री से कुछ नुकसान की भरपाई हो सकेगी। लेकिन इस रविवार की फीकी खरीदारी यह याद दिलाती है कि राजधानी में बड़े आयोजन और बाजार की रफ्तार के बीच संतुलन बनाना कितना जरूरी है।


























