उत्तर प्रदेश में अगले विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही राजनीतिक दलों की रणनीतियाँ आकार लेने लगी हैं। कांग्रेस ने भी राज्य में अपनी खोई जमीन वापस पाने की कवायद तेज कर दी है। सोमवार को पार्टी की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी की मौजूदगी में प्रदेश के नेताओं की एक अहम बैठक हुई। इसमें तय किया गया कि पार्टी फिलहाल 200 से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी करेगी। बैठक का सबसे अहम पहलू यह रहा कि कांग्रेस ने अपनी तैयारी को किसी एक रास्ते तक सीमित नहीं रखा है। पार्टी नेताओं का कहना है कि संगठन को मजबूत करने और ज्यादा सीटों पर तैयारी करने का मकसद बातचीत की मेज पर मजबूत स्थिति में बैठना भी है। यानी कांग्रेस अकेले मैदान में उतरने की संभावना को जिंदा रखते हुए गठबंधन का विकल्प भी खुला रख रही है।
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा में कुल 403 सीटें हैं। ऐसे में 200 से अधिक सीटों पर तैयारी का मतलब है कि कांग्रेस आधी से ज्यादा सीटों पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराना चाहती है। प्रदेश प्रभारी की जिम्मेदारी संभालने के बाद से राजेंद्र पाल गौतम लगातार एक ही बात दोहरा रहे हैं कि गठबंधन होगा तो बराबरी और समानता के आधार पर होगा। उनका रुख साफ है कि सहयोगी दल के साथ तालमेल सम्मानजनक शर्तों पर ही आगे बढ़ना चाहिए। पार्टी के भीतर भी यह भावना मजबूत है कि कांग्रेस को केवल सीमित सीटों तक समेटकर नहीं देखा जाना चाहिए।
दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी की ओर से अब तक जो संकेत सामने आए हैं, उनके मुताबिक कांग्रेस को 50 से 55 सीटें देने की बात चल रही है। कांग्रेस की 200 सीटों की तैयारी और सपा के इस कथित प्रस्ताव के बीच काफी बड़ा फासला है। यही वजह है कि आने वाले दिनों में सीटों के बंटवारे को लेकर खींचतान की संभावना जताई जा रही है। दोनों दलों के नेता फिलहाल सार्वजनिक रूप से संयम बरत रहे हैं। यह भी तय है कि अंतिम फैसला प्रदेश स्तर पर नहीं होगा। गठबंधन होगा या नहीं, और होगा तो किस फॉर्मूले पर, यह दोनों पार्टियों का शीर्ष नेतृत्व आपसी बातचीत के बाद ही तय करेगा।
कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश का सफर पिछले कुछ चुनावों में आसान नहीं रहा है। 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने सभी 403 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन उसे सिर्फ दो सीटें मिलीं। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा के साथ गठबंधन करके उसने बेहतर प्रदर्शन किया और छह सीटें जीतीं। इसी अनुभव के आधार पर पार्टी के कई नेता मानते हैं कि साझेदारी से फायदा मिल सकता है, बशर्ते सीटों का बंटवारा संतुलित हो। अब सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि कांग्रेस अपनी 200 सीटों की तैयारी को जमीन पर कैसे उतारती है और सपा के साथ बातचीत किस दिशा में जाती है। संगठन को सक्रिय करना, बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को जोड़ना और मजबूत उम्मीदवार तलाशना पार्टी के सामने बड़ी चुनौतियाँ हैं। आने वाले हफ्तों में होने वाली बैठकें तय करेंगी कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस अकेले चलेगी या सपा के साथ कदम मिलाएगी।























