लखनऊ: उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में पूर्व आईएएस दिव्या मित्तल की राजनीतिक पारी ने एक बार फिर इस सवाल को चर्चा में ला दिया है कि क्या प्रशासनिक अनुभव चुनावी राजनीति में जनसमर्थन में बदल सकता है? 15 अक्टूबर 2026 को दिव्या मित्तल ने अपनी पार्टी ‘जननीति भारत’ की घोषणा की और 2027 के विधानसभा चुनाव में उतरने का ऐलान किया। उन्होंने जनता की भागीदारी, नीतिगत फैसलों में नागरिकों की भूमिका और सरकार की जवाबदेही को अपनी राजनीतिक सोच का आधार बताया।
यूपी में यह प्रयोग नया नहीं है। आईएएस, आईपीएस और अन्य सरकारी सेवाओं से जुड़े कई अधिकारी सेवानिवृत्ति या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद राजनीति में आए। कुछ विधायक, सांसद और मंत्री बने, जबकि कुछ ने अपनी राजनीतिक पार्टियां बनाकर वैकल्पिक व्यवस्था खड़ी करने की कोशिश की। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि प्रशासनिक अनुभव राजनीति में प्रवेश का आधार बन सकता है, लेकिन चुनावी सफलता के लिए संगठन, जनसंपर्क और मतदाताओं का विश्वास भी जरूरी है।
दिव्या मित्तल: प्रशासनिक पहचान से राजनीतिक विकल्प तक
दिव्या मित्तल 2013 बैच की आईएएस अधिकारी रही हैं। उन्होंने उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में प्रशासनिक जिम्मेदारियां संभालीं और मिर्जापुर की जिलाधिकारी के रूप में भी काम किया। अगस्त 2026 में सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने के बाद उन्होंने सितंबर में राजनीति में आने की घोषणा की। अक्टूबर में उन्होंने अपनी पार्टी का नाम सार्वजनिक किया और 2027 के विधानसभा चुनाव में उतरने का ऐलान किया।
दिव्या मित्तल की पहल की खास बात यह है कि उन्होंने किसी स्थापित राजनीतिक दल में शामिल होने के बजाय अपना मंच बनाने का रास्ता चुना है। उनकी घोषित राजनीतिक सोच में जनता को नीतियों के निर्माण में भागीदार बनाना और निर्वाचित सरकार को पूरे पांच साल जवाबदेह बनाए रखना शामिल है।
उत्तर प्रदेश के अफसर जो बाद में बने नेता
1. पी.एल. पुनिया: आईएएस से सांसद तक
पूर्व आईएएस अधिकारी पी.एल. पुनिया प्रशासनिक सेवा के बाद कांग्रेस में शामिल हुए। उन्होंने 2009 में बाराबंकी से लोकसभा चुनाव जीता और बाद में राज्यसभा भी पहुंचे। उनका सफर बताता है कि प्रशासनिक अनुभव के साथ किसी स्थापित दल का संगठन और राजनीतिक मंच चुनावी सफलता का रास्ता बन सकता है।
2. अरविंद कुमार शर्मा: प्रशासन से सरकार तक
1988 बैच के आईएएस अधिकारी अरविंद कुमार शर्मा ने जनवरी 2021 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद भाजपा का दामन थामा। बाद में वे उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य बने और योगी सरकार में मंत्री की जिम्मेदारी संभाली। उनका उदाहरण दिखाता है कि राजनीति में आने के लिए सीधे विधानसभा चुनाव लड़ना ही एकमात्र रास्ता नहीं है।
3. बृजलाल: पुलिस सेवा से राज्यसभा तक
उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी बृजलाल सेवानिवृत्ति के बाद भाजपा में शामिल हुए और राज्यसभा के सदस्य बने। उनका राजनीतिक सफर इस बात का उदाहरण है कि पुलिस प्रशासन में लंबे अनुभव के बाद संसद के उच्च सदन तक भी पहुंचा जा सकता है।
4. असीम अरुण: आईपीएस से विधायक और मंत्री
1994 बैच के आईपीएस अधिकारी असीम अरुण ने कानपुर के पुलिस आयुक्त पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर 2022 में भाजपा के टिकट पर कन्नौज सदर से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। बाद में वे राज्य सरकार में मंत्री बने। उनकी यात्रा हाल के वर्षों में नौकरशाही से सीधे चुनावी राजनीति में आने का प्रमुख उदाहरण है।
5. राजेश्वर सिंह: ईडी से विधानसभा तक
प्रवर्तन निदेशालय के पूर्व संयुक्त निदेशक राजेश्वर सिंह ने 2022 में भाजपा के टिकट पर लखनऊ की सरोजिनी नगर सीट से चुनाव जीता। उनकी जीत से यह स्पष्ट हुआ कि जांच एजेंसियों में काम करने वाले अधिकारी भी राजनीतिक दल के उम्मीदवार के रूप में सीधे चुनावी मैदान में उतर सकते हैं।
दिव्या मित्तल के सामने 2027 की चुनौती
दिव्या मित्तल ने ‘जननीति भारत’ के जरिए जनता की भागीदारी और सरकार की जवाबदेही पर जोर दिया है। रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने मिर्जापुर सदर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की भी घोषणा की है।
अब उनके सामने प्रशासनिक पहचान को राजनीतिक संगठन में बदलने की चुनौती होगी। उन्हें अपने विचारों को ठोस नीतियों में बदलना होगा, स्थानीय नेतृत्व तैयार करना होगा और मतदाताओं के बीच निरंतर संवाद स्थापित करना होगा। उत्तर प्रदेश की राजनीति में क्षेत्रीय मुद्दों, सामाजिक समीकरणों, उम्मीदवारों की स्थानीय पकड़ और संगठन की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है।
उत्तर प्रदेश में नौकरशाहों का राजनीति में प्रवेश पुरानी परंपरा है, लेकिन हर अधिकारी का राजनीतिक सफर अलग रहा है। कुछ ने संसद और विधानसभा तक जगह बनाई, जबकि कुछ अपनी पार्टी को व्यापक जनाधार दिलाने के संघर्ष में हैं। दिव्या मित्तल की नई पहल भी इसी कसौटी पर परखी जाएगी, क्या प्रशासनिक अनुभव और जनता की भागीदारी का उनका विचार एक संगठित राजनीतिक विकल्प में बदल पाएगा? इसका जवाब अंततः जनता का जनादेश देगा।
रिपोर्ट: अवनीश विद्यार्थी
























