लखनऊ: समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान (Azam Khan) की मुश्किलें खत्म नहीं हो रही हैं। उनके ड्रीम प्रोजेक्ट जौहर यूनिवर्सिटी की 426 करोड़ की संपत्ति को प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने कुर्क कर लिया है। बता दें कि इसी साल 19 अगस्त को लखनऊ से जांच एजेंसी की टीम जौहर यूनिवर्सिटी पहुंची थी जहां पर कई महत्वपूर्ण कागजातों को खंगाला गया था, यही नहीं आजम खान के कई करीबियों के ठिकानों पर भी छापेमारी की थी।
इसके बाद 14 अक्तूबर को एक बार फिर ईडी ने रामपुर में दस्तक दी थी और आजम खान से जेल में पहुंच कर कई घंटे तक पूछताछ की थी। इसके बाद ईडी टीम के द्वारा आजम खान, जौहर ट्रस्ट सहित कुल 5 के खिलाफ रामपुर जनपद के ही अजीम नगर थाने में एफआईआर दर्ज कराई गई थी।
अब इसमें बड़ा और ताजा अपडेट यह है कि ईडी की ओर से 426.46 करोड़ की संपत्ति अस्थाई रूप से कर्क की गई है और जिसका बाजार मूल्य करीब 1170 करोड रुपए आंका गया है। ईडी की इस कार्रवाई के बाद जौहर यूनिवर्सिटी परिसर में खामोशी छा गई है।
मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत कार्रवाई
प्रवर्तन निदेशालय (ED) के लखनऊ जोनल कार्यालय ने धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (PMLA) के तहत रामपुर स्थित मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी की जमीन और इमारतों के खिलााफ कुर्की की ये कार्रवाई की है। कुर्क की गई संपत्ति का मूल्य 426.46 करोड़ है, जबकि इसका वर्तमान बाजार मूल्य लगभग 1170 करोड़ आंका गया है।
किसानों की जमीन पर जबरन कब्जे का आरोप
ईडी ने रामपुर के अजीमनगर थाने में दर्ज 26 एफआईआर के आधार पर धन शोधन निवारण अधिनियम के तहत जांच शुरू की थी। इन एफआईआर में भारतीय दंड संहिता की धारा 384 और अन्य धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे कि यूनिवर्सिटी के लिए किसानों की कृषि भूमि पर जबरन कब्जा किया गया।
इसके अतिरिक्त, रामपुर जिला प्रशासन की जांच रिपोर्ट के अनुसार, गांव सिंहान खेड़ा में लगभग 34 एकड़ क्षेत्रफल वाले शत्रु संपत्ति के 45 भूखंडों पर भी मोहम्मद आजम खान द्वारा यूनिवर्सिटी के लिए अवैध रूप से कब्जा किए जाने का आरोप है।
यह कब्जा उस समय भी जारी रहा, जब कस्टोडियन द्वारा ट्रस्ट को दी गई जमीन की लीज रद्द कर दी गई थी। बाद में गृह मंत्रालय के अंतर्गत शत्रु संपत्ति अभिरक्षक ने रामपुर जिला प्रशासन के माध्यम से इस जमीन का कब्जा वापस ले लिया।
सरकारी धन को यूनिवर्सिटी में लगाने का आरोप
जांच के दौरान ईडी ने पाया कि सार्वजनिक कार्यों के लिए निर्धारित धन को यूनिवर्सिटी में लगाया गया। सरकारी कार्य यूनिवर्सिटी के निजी परिसर में कराए गए और सरकारी ठेके हासिल करने वाले ठेकेदारों से धन दान के रूप में वापस ट्रस्ट तक पहुंचाया गया।
रिपोर्ट: अभिषेक पांडेय



























