यूपी: उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 विधानसभा चुनाव की आहट तेज होने लगी है। चुनाव अभी दूर है, लेकिन राजनीतिक दलों ने वोटरों के मूड को समझने और उसे अपने पक्ष में बनाए रखने की कोशिश शुरू कर दी है। यूपी की राजनीति में एक-एक प्रतिशत वोट का बदलाव भी कई सीटों के समीकरण को बदल सकता है। ऐसे में आने वाले विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी लड़ाई सिर्फ सीटों की नहीं, बल्कि वोट प्रतिशत को अपने साथ जोड़ने की होगी। यूपी के मतदाता कई बार चुनाव-दर-चुनाव अपना रुख बदलते रहे हैं। कभी सत्ता के पक्ष में माहौल बना तो कभी विपक्ष को मौका मिला। यही वजह है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों को राजनीतिक दल बेहद ध्यान से देख रहे हैं।
2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में कुल मतदान प्रतिशत करीब 57 फीसदी रहा। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में 15.44 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं में से करीब 8.80 करोड़ वोट पड़े थे। लोकसभा चुनाव के नतीजों ने प्रदेश की राजनीति में एक अलग तस्वीर पेश की। ऐसे में अब सत्तारूढ़ गठबंधन के सामने चुनौती है कि वह 2024 में हुए वोट शेयर के बदलाव को विधानसभा चुनाव तक किस तरह पलटता या संतुलित करता है। वहीं विपक्षी गठबंधन के सामने चुनौती अपने पक्ष में बने वोटर आधार को बनाए रखने की है। यही वजह है कि 2027 की लड़ाई में ‘वोट शेयर’ सबसे बड़ा राजनीतिक संकेतक बनकर सामने आ रहा है।
उत्तर प्रदेश में भाजपा के लिए पिछले विधानसभा चुनावों का रिकॉर्ड भी अहम है। 2017 में पार्टी ने भारी बहुमत के साथ सरकार बनाई थी, जबकि 2022 में भी वह सत्ता में वापस लौटी, हालांकि उसकी सीटों और वोट शेयर में बदलाव देखने को मिला। अब 2027 में भाजपा के सामने सवाल यह है कि 2024 लोकसभा चुनाव में जिन इलाकों में पार्टी का प्रदर्शन कमजोर रहा, वहां वोटरों के बीच अपनी पकड़ को किस तरह मजबूत किया जाए। इसके लिए सिर्फ पुराने समर्थकों का वोट बनाए रखना काफी नहीं होगा। नए मतदाताओं, युवाओं, महिलाओं, शहरी वोटरों और अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच समर्थन बढ़ाना भी चुनावी रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी और उसके सहयोगियों के सामने 2024 लोकसभा चुनाव में मिले समर्थन को विधानसभा चुनाव में बनाए रखने की चुनौती होगी। लोकसभा और विधानसभा चुनाव के मुद्दे हमेशा एक जैसे नहीं होते। लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय मुद्दे और केंद्र सरकार का कामकाज ज्यादा असर डाल सकता है, जबकि विधानसभा चुनाव में स्थानीय उम्मीदवार, कानून-व्यवस्था, रोजगार, महंगाई, किसान, सड़क, बिजली, सरकारी योजनाएं और क्षेत्रीय मुद्दे ज्यादा चर्चा में आ सकते हैं। इसलिए 2024 में किसी दल या गठबंधन को मिला वोट अपने आप 2027 में भी उसी अनुपात में मिल जाए, यह तय नहीं माना जा सकता।
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में वोट प्रतिशत का मामूली बदलाव भी कई विधानसभा सीटों पर असर डाल सकता है। कई सीटों पर मुकाबला करीबी रहता है और वहां कुछ हजार वोट का अंतर जीत-हार तय कर देता है। यही कारण है कि राजनीतिक दल अब बूथ स्तर तक अपने वोटरों के आंकड़ों को समझने की कोशिश करते हैं। कौन सा क्षेत्र मजबूत रहा, कहां मतदान कम हुआ, किन इलाकों में वोटों का ट्रांसफर नहीं हुआ और कहां विरोधी दल को बढ़त मिली, इन सवालों के जवाब चुनावी रणनीति तैयार करने में अहम होंगे।
चुनाव में सिर्फ यह मायने नहीं रखता कि किस दल को कितने वोट मिले, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण होता है कि कुल मतदाताओं में से कितने लोग मतदान करने पहुंचे। 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में मतदान प्रतिशत करीब 57 फीसदी रहा था। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार अलग-अलग लोकसभा क्षेत्रों में मतदान प्रतिशत में काफी अंतर रहा। उदाहरण के तौर पर 2024 में गौतम बुद्ध नगर में करीब 53.7 फीसदी, गाजियाबाद में 49.9 फीसदी और मेरठ में 59 फीसदी मतदान दर्ज किया गया। इस अंतर से साफ है कि प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में मतदाताओं की भागीदारी एक जैसी नहीं रही। ऐसे में 2027 में राजनीतिक दलों की नजर इस बात पर भी रहेगी कि किन क्षेत्रों में मतदान बढ़ता है और उसका फायदा किस राजनीतिक खेमे को मिलता है।
यही सबसे बड़ा सवाल है। 2024 के लोकसभा चुनाव में मतदाताओं ने जिस तरह मतदान किया, क्या वही रुझान विधानसभा चुनाव में भी दिखाई देगा या फिर स्थानीय मुद्दों के आधार पर नया समीकरण बनेगा? इसका जवाब अभी तय नहीं है। विधानसभा चुनाव तक कई राजनीतिक घटनाक्रम हो सकते हैं। सरकार के कामकाज, विपक्ष की रणनीति, उम्मीदवारों का चयन, स्थानीय मुद्दे और अलग-अलग सामाजिक समूहों का रुख चुनावी तस्वीर को प्रभावित कर सकता है। इसलिए 2024 के लोकसभा नतीजों को 2027 का सीधा संकेत मानना जल्दबाजी होगी। लेकिन ये नतीजे राजनीतिक दलों को यह जरूर बताते हैं कि किन क्षेत्रों में उन्हें अपनी रणनीति पर दोबारा काम करने की जरूरत है।
आने वाले विधानसभा चुनाव में दोनों प्रमुख राजनीतिक खेमों के सामने अलग-अलग चुनौतियां होंगी। भाजपा और उसके सहयोगियों की कोशिश उन वोटरों को फिर से अपने साथ जोड़ने की होगी, जहां 2024 में समर्थन में कमी आई थी। वहीं विपक्षी दलों की चुनौती अपने साथ आए वोटरों को विधानसभा चुनाव तक जोड़े रखना और नए वोटरों तक पहुंच बनाना होगी। यूपी में चुनावी राजनीति का गणित काफी हद तक इसी बात पर निर्भर करता है कि कौन सा दल अपने पारंपरिक वोट बैंक को कितना बनाए रखता है और दूसरे सामाजिक समूहों में कितनी सेंध लगा पाता है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल यही है कि 2024 में बदला वोटरों का मूड 2027 में भी कायम रहेगा या मतदाता एक बार फिर अपना फैसला बदलेंगे। चुनाव आयोग के रिकॉर्ड में उत्तर प्रदेश की विधानसभा के मौजूदा कार्यकाल की शुरुआत 23 मई 2022 और समाप्ति 22 मई 2027 दर्ज है। यानी अगले विधानसभा चुनाव की संवैधानिक समयसीमा सामने है। राजनीतिक दल 2024 के आंकड़ों, विधानसभा क्षेत्रवार प्रदर्शन और अपने संगठन की स्थिति को समझने में जुटे हैं। आने वाले महीनों में मुद्दे और समीकरण जितने स्पष्ट होंगे, 2027 की चुनावी तस्वीर भी उतनी साफ होती जाएगी। आखिरकार यूपी की सियासत में फैसला सिर्फ बड़े नारों से नहीं, बल्कि बूथ तक पहुंचने वाले वोट और मतदान के दिन मतदाता के फैसले से होगा।

