उत्तर प्रदेश की राजनीति में राज्यसभा चुनाव का पारा अचानक चढ़ गया है। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने कुछ दिन पहले कहा था कि पार्टी “सरप्राइज” देगी। अब वह सरप्राइज सामने है। सपा ने रिलायंस इंडस्ट्रीज के ग्रुप प्रेसिडेंट धनराज परिमल नथवानी को उम्मीदवार बनाकर बड़ा दांव खेला है। इसके बाद भाजपा खेमे में बेचैनी साफ दिखने लगी है। राज्य की 10 राज्यसभा सीटों पर चुनाव होना है। विधानसभा की मौजूदा संख्या के हिसाब से एक सीट जीतने के लिए करीब 37 प्रथम वरीयता वोट चाहिए। इस गणित में भाजपा सात और सपा दो सीटें आसानी से जीत लेगी, और दोनों के पास लगभग 29-29 अतिरिक्त वोट बचेंगे। असली लड़ाई दसवीं सीट की है, जिसके लिए दोनों दलों के बीच शह और मात का खेल चल रहा है। आंकड़े देखें तो भाजपा को आठवीं सीट निकालने के लिए 12 अतिरिक्त वोट चाहिए, जबकि सपा को तीसरी सीट के लिए 11 वोटों की जरूरत है। यानी फासला बहुत बड़ा नहीं है, और यहीं से क्रॉस वोटिंग की अटकलें शुरू होती हैं।
नथवानी का नाम इसलिए चौंकाने वाला है कि वे परंपरागत राजनीतिक चेहरे नहीं, बल्कि जाने-माने उद्योगपति हैं। सियासी जानकार मानते हैं कि उनके संपर्क और संसाधन सपा को अतिरिक्त वोट जुटाने में मदद कर सकते हैं। यह भी कहा जा रहा है कि अखिलेश की नजर भाजपा के सहयोगी दलों के विधायकों पर है। एक चर्चा यह भी है कि अगर सपा अगड़ी या गैर-यादव पिछड़ी जाति का उम्मीदवार उतारती है, तो एनडीए के विधायकों में फूट पड़ सकती है। साथ ही बसपा के इकलौते विधायक उमाशंकर सिंह का निधन हो चुका है, जिन्होंने पिछली बार भाजपा उम्मीदवार को वोट दिया था। इससे भी समीकरण बदले हैं। भाजपा भी हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठी है। पार्टी की कोर कमेटी की बैठक में आठ उम्मीदवार उतारने पर सहमति बनने की बात सामने आई है। भाजपा की ओर से आठ और सपा की ओर से चार नामांकन फॉर्म खरीदे जाने की खबर है, यानी 10 सीटों के लिए 12 दावेदार हो सकते हैं। हालांकि फॉर्म खरीदने का मतलब यह नहीं कि नामांकन तय है। कुछ राजनीतिक विश्लेषक तो यहां तक कहते हैं कि सपा की चाल रोकने के लिए भाजपा किसी मजबूत निर्दलीय को समर्थन देने या नौवां उम्मीदवार उतारने जैसा कदम भी उठा सकती है।
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उत्तर प्रदेश के लोगों को 2024 का राज्यसभा चुनाव अभी भूला नहीं है। तब भाजपा ने अचानक उद्योगपति संजय सेठ को आठवां उम्मीदवार बनाकर पूरा गणित बिगाड़ दिया था। सपा के मुख्य सचेतक मनोज कुमार पांडेय समेत सात विधायकों की क्रॉस वोटिंग से सेठ जीते और सपा के तीसरे प्रत्याशी आलोक रंजन हार गए। वह अखिलेश यादव के लिए बड़ा झटका था। अब बाजी पलटती दिख रही है, क्योंकि इस बार पहल सपा की ओर से हुई है और भाजपा को जवाब सोचना है। असल तस्वीर नामांकन की आखिरी तारीख और वापसी के बाद ही साफ होगी। अगर उम्मीदवारों की संख्या सीटों के बराबर रही, तो सभी निर्विरोध चुने जाएंगे। लेकिन अगर मुकाबला हुआ, तो मतदान के दिन हर एक वोट कीमती होगा और विधायकों की निष्ठा की कड़ी परीक्षा होगी। फिलहाल दोनों दल अपने विधायकों को एकजुट रखने और दूसरे पाले में सेंध लगाने की कोशिश में जुटे हैं। भाजपा आठवां प्रत्याशी उतारने का जोखिम लेगी या नहीं, इसका जवाब आने वाले कुछ दिनों में मिल जाएगा।
रिपोर्ट- सोनू सिंह






















