उत्तर प्रदेश चुनाव का बिगुल बजने से पहले सूबे में सियासी हलचल तेज हो गई है। एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी की एंट्री विपक्षी दलों के समीकरण बिगाड़ सकती है। विधानसभा चुनाव में अब कुछ माह शेष बचे है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी विपक्ष की धुरी मानी जा रही है। समाजवादी पार्टी एमवाई (मुस्लिम यादव) समीकरण के साथ राज्य में चार बार चुनाव जीतकर सरकार बना चुकी है। लेकिन इस बार अखिलेश यादव ने पीडीए (पिछड़ा दलित और अल्पसंख्यक) समीकरण पर दांव खेला है। सपा के इस गणित को अल्पसंख्यक नेता असदुद्दीन ओवैसी बिगाड़ सकते है।
पिछड़ा, दलित से मोह
उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है। एआईएमआईएम चीफ असदुद्दीन ओवैसी की उपस्थिति राज्य में बढ़ती जा रही है। जिसके चलते समाजवादी पार्टी के लिए असामान्य स्थिति बनती जा रही है। क्योंकि पिछले सभी चुनावों में जब-जब समाजवादी पार्टी को मुस्लिम वोटों का साथ मिला है सपा ने सरकार बनाने में सफलता प्राप्त की है। पिछले 2022 के विधानसभा चुनावों में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी को सबसे अधिक नुकसान एआईएमआईएम ने पहुंचाया था। जिसकी काट के लिए अखिलेश को अपने परंपरागत मुस्लिम वोटों के इतर पिछड़ा वर्ग और दलित को भी साधना पड़ा है।
आजम खान फैक्टर
निर्विवाद रुप से आजम खान को समाजवादी पार्टी में बड़ा मुस्लिम चेहरा माना जाता है। पिछले कई चुनावों में उनकी उपस्थिति पार्टी के लिए फायदे का सौदा रही है। लेकिन राज्य में बीजेपी की योगी सरकार आने के बाद से उनके सितारे गर्दिश में चल रहे है। फिलहाल उनपर चल रहे मुकदमों के चलते वे रामपुर जेल में बंद है। उनके साथ उनके छोटे बेटे भी जेल में सजा काट रहे है। अखिलेश यादव भी जानते है कि उनकी वैतरणी को पार लगाने के लिए किसी बड़े मुस्लिम चेहरे की आवश्यकता है। मुस्लिम समाज को मैसेज देने के लिए हाल ही में वे रामपुर जेल में बंद अपने सबसे भरोसेमंद आजम खान से मिलने पहुंचे। इस दौरान वे उनके घर जाकर उनकी पत्नी और बड़े बेटे से भी मिले।
वोट ध्रुवीकरण का फायदा
ओवैसी उत्तर प्रदेश में छोटे दलों के साथ गठबंधन बनाकर चुनाव में उतरने की तैयारी कर रहे है, लेकिन वे भली भांति जानते है कि यूपी जैसे बड़े राज्य में सपा और बसपा के समर्थन से ही वे राज्य की सत्ता तक पहुंच सकते है। दूसरी तरफ सपा और बसपा को डर है कि एआईएमआईएम से हाथ मिलाने के बाद उनका मुस्लिम जनाधार उनके हाथ से खिसक सकता है। यूपी की दोनों पार्टियां किसी भी सूरत में असदुद्दीन से हाथ नहीं मिलाना चाहती। यूपी में बने इस समीकरण का सीधा फायदा भारतीय जनता पार्टी को होता है और पिछले दो विधानसभा चुनावों के परिणामों ने यह सिद्ध भी किया है।
आक्रामक हुए ओवैसी
हालांकि ओवैसी प्रदेश में सरकार बनाने के लिए नहीं अपितु सपा और बसपा को अधिक से अधिक नुकसान पहुंचाने के लिए चुनाव मैदान में है। क्योंकि वे जानते है कि सपा और बसपा लगातार चुनावी हार से आहत होकर उनके साथ गठबंधन कर सकते हैं। ओवैसी ने शामली में एक रैली के दौरान मुजफ्फरनगर दंगों पर टिप्पणी देते हुए सपा से सवाल किया कि मुजफ्फरनगर दंगों में अल्पसंख्यकों को विस्थापित होना पड़ा था। उस समय अखिलेश की सरकार थी। उन्होंने सपा पर परिवारवाद का आरोप लगाते हुए कहा कि मुस्लिमों की वोट से सरकार बनाने वाले दल सभी बड़े पद अपने परिवार के सदस्यों को क्यों दे देते हैं।
दो मोर्चों पर लड़ाई
गौरतलब है कि अखिलेश को भारतीय जनता पार्टी के साथ एआईएमआईएम के लिए भी रणनीति बनानी होगी। अखिलेश को अब मुस्लिम वोटों के अतिरिक्त पिछड़ा वर्ग और दलित वोटों पर भी नजर बनाकर रखी होगी। हालांकि पीडिए के साथ समाजवादी पार्टी ने पिछले लोकसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन किया था। जिसका परिणाम हुआ कि भाजपा को यूपी में भारी नुकसान देखना पड़ा था। लेकिन पीडिए का नारा सपा के साथ विधानसभा में भी काम करेगा यह देखने वाली बात है।
स्पेशल रिपोर्ट- सोनू सिंह
























