उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले सपा और कांग्रेस में सीट बंटवारे को लेकर खींचतान चल रही है। चर्चा है कि कांग्रेस ने सपा के सामने 180 सीटों की सूची रखी है। जिसके बाद दोनों दलों के बीच तनातनी बढ़ गई है। सूची सामने आने के बाद से सियासी गलियारों में हलचल तेज है और हर कोई यही जानना चाहता है कि आखिर बात कहां तक पहुंची है।
सुलह की कोशिश
इस मसले को सुलझाने के लिए समाजवादी पार्टी के सांसद राजीव राय ने कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी से मुलाकात की है। बताया जा रहा है कि इस मुलाकात में उन्होंने सीटों की सूची से जुड़ा मुद्दा उठाया है। सपा आलाकमान गठबंधन को बनाए रखने के लिए इस मामले को जल्द से जल्द निपटाना चाहता है। राजीव राय और प्रियंका गांधी के बीच हुई सकारात्मक मुलाकात को दोनों दलों के बीच आई दरार को कम करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
गठबंधन का महत्व
दिलचस्प बात यह है कि इस तकरार के बावजूद दोनों पार्टियां अच्छी तरह जानती हैं कि साथ चलना उनकी साझा जरूरत है। उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की योगी सरकार को सत्ता से बाहर करने का लक्ष्य तभी साधा जा सकता है, जब विपक्ष वोटों को बंटने से रोकने में सफल रहे। पिछला विधानसभा चुनावों का परिणाम इसका जीता जागता सबूत है जब बंटे हुए विपक्ष ने सत्ताधारी दल के लिए राह आसान कर दी थी। यही वजह है कि बयानबाजी और दबाव की राजनीति के बीच भी दोनों तरफ से तालमेल की गुंजाइश बनाए रखने की कोशिश दिख रही है।
180 सीटों की मांग
दूसरी ओर, कांग्रेस चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी से अधिक से अधिक सीटें मांग रही है। पार्टी का तर्क साफ है। वह चाहती है कि अधिक सीटों पर चुनाव लड़कर प्रदेश में अपनी स्थिति मजबूत करे। लंबे समय से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का संगठन कमजोर माना जाता रहा है। ऐसे में पार्टी नेतृत्व को लगता है कि अगर गठबंधन में उसे पर्याप्त हिस्सेदारी मिलती है, तो कार्यकर्ताओं में नया जोश आएगा और जमीनी स्तर पर संगठन को दोबारा खड़ा करने का मौका मिलेगा। सीटों की संख्या सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं होती। यह किसी पार्टी की ताकत, उसके आत्मविश्वास और भविष्य की राजनीतिक संभावनाओं से भी जुड़ी होती है। कांग्रेस के लिए यह मांग अपने अस्तित्व और पहचान को नए सिरे से स्थापित करने की कोशिश भी है।
सपा के सामने संतुलन की चुनौती
समाजवादी पार्टी के सामने भी कम चुनौतियां नहीं हैं। प्रदेश में उसका आधार मजबूत है और वह खुद को भाजपा के मुकाबले मुख्य विपक्षी ताकत के रूप में देखती है। ऐसे में सहयोगी दल को सीटें देते समय उसे अपने कार्यकर्ताओं, संभावित उम्मीदवारों और स्थानीय समीकरणों का ध्यान भी रखना पड़ता है। हर सीट के साथ कई दावेदार, जातीय गणित और क्षेत्रीय समीकरण जुड़े होते हैं। इसलिए सीटों का बंटवारा दोनों दलों के लिए संतुलन साधने की कठिन परीक्षा बन जाता है।
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आगे की राह
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि गठबंधन की राजनीति में ऐसी खींचतान कोई नई बात नहीं है। अक्सर शुरुआती दौर में दोनों पक्ष ज्यादा से ज्यादा हिस्सेदारी के लिए दबाव बनाते हैं और अंतिम फैसला आपसी समझौते से निकलता है। अब देखना यह होगा कि 180 सीटों की सूची पर बनी असहमति किस तरह सुलझती है और क्या दोनों दल ऐसे फॉर्मूले पर पहुंच पाते हैं, जो दोनों को स्वीकार्य हो। फिलहाल इतना तय है कि अगले चुनाव की तस्वीर काफी हद तक इसी पर निर्भर करेगी कि विपक्ष एकजुट होकर मैदान में उतरता है या सीटों की इस रस्साकशी में उलझकर रह जाता है। जनता की नजर भी इसी पर टिकी है कि क्या विपक्षी एकता केवल बयानों तक सीमित रहेगी या जमीन पर भी दिखाई देगी।






















