भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया से जुड़े मानहानि मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने बृहस्पतिवार को सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के सह संयोजक सौरव दास और आशुतोष रांका को गौरव भाटिया के खिलाफ किए गए कुछ आपत्तिजनक पोस्ट हटाने को कहा है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने कहा कि सोशल मीडिया पर अपनी बात रखने का अधिकार सभी को है, लेकिन किसी व्यक्ति के बारे में कोई दावा या आरोप करने से पहले उसकी पुष्टि करना भी जरूरी है।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की अदालत में हुई। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने विशेष तौर पर सोशल मीडिया पर टिप्पणी और पोस्ट करने के तरीके को लेकर दोनों नेताओं को नसीहत दी। अदालत ने कहा कि युवा अपनी बात खुलकर रख सकते हैं और उन्हें अपनी चिंताओं को सामने रखने का पूरा अधिकार है, लेकिन बिना तथ्यों की जांच किए किसी के बारे में पोस्ट करना उचित नहीं है।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति गेडेला ने कहा कि युवाओं को अपनी राय रखने से रोका नहीं जा सकता। हालांकि, किसी भी मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से कुछ लिखने या आरोप लगाने से पहले यह देखना जरूरी है कि जानकारी सही है या नहीं।
कोर्ट ने कहा कि आप सभी युवा हैं और हो सकता है कि आपकी अपनी चिंताएं और मुद्दे हों। उन्हें सामने रखने का अधिकार भी है, लेकिन बिना पुष्टि किए किसी बात को सोशल मीडिया पर पोस्ट करना सही तरीका नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि अपनी बात को बेहतर और जिम्मेदारी के साथ रखने की जरूरत है।
कोर्ट की टिप्पणी ऐसे समय में आई है, जब सोशल मीडिया पर राजनीतिक दलों और नेताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेजी से सामने आते हैं। अदालत ने साफ किया कि अभिव्यक्ति की आजादी के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई है। सुनवाई के दौरान सौरव दास और आशुतोष रांका की ओर से पेश वकीलों ने अदालत को आश्वासन दिया कि जिन सोशल मीडिया पोस्ट पर गौरव भाटिया की ओर से आपत्ति जताई गई है, उन्हें 24 घंटे के भीतर हटा दिया जाएगा।
यानी विवादित पोस्ट को लेकर प्रतिवादियों की ओर से उन्हें हटाने की सहमति दी गई है। अदालत ने इस आश्वासन को सुनवाई के दौरान दर्ज किया और आगे की कार्यवाही के लिए मामले को जारी रखा। इस मामले में गौरव भाटिया खुद अदालत में पेश हुए। सुनवाई के दौरान अदालत की ओर से मध्यस्थता यानी मीडिएशन का विकल्प सामने रखा गया, लेकिन भाटिया ने इस सुझाव को स्वीकार नहीं किया।
भाटिया ने अदालत से आग्रह किया कि केवल मौजूदा पोस्ट हटाने तक मामला सीमित न रहे, बल्कि प्रतिवादियों को भविष्य में भी इस तरह के मानहानिकारक ट्वीट या सोशल मीडिया पोस्ट करने से रोका जाए। उनकी ओर से अदालत में यह मांग रखी गई कि आगे ऐसी सामग्री पोस्ट नहीं की जानी चाहिए, जिससे उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचने का आरोप हो।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वह इस स्तर पर गौरव भाटिया की ओर से मांगी गई अंतरिम राहत के मुद्दे को खत्म नहीं कर रहा है। अदालत ने भाटिया से कहा कि उनकी अर्जी को समाप्त नहीं किया जा रहा है, बल्कि फिलहाल प्रतिवादियों को एक मौका दिया जा रहा है और विवादित पोस्ट हटाने के लिए कहा गया है। न्यायमूर्ति गेडेला ने स्पष्ट किया कि अदालत का मौजूदा आदेश मामले का अंतिम फैसला नहीं है। कोर्ट ने फिलहाल पोस्ट हटाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का निर्देश दिया है और अंतरिम राहत से जुड़ा मुद्दा खुला रखा है।
इस सुनवाई में हाईकोर्ट की टिप्पणी इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि मामला सीधे तौर पर सोशल मीडिया पर किए गए पोस्ट और उनके कानूनी असर से जुड़ा है। आज के समय में किसी व्यक्ति के खिलाफ सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणी बहुत तेजी से लोगों तक पहुंच सकती है। ऐसे में बिना तथ्यों की पुष्टि किए लगाए गए आरोप किसी की प्रतिष्ठा को प्रभावित कर सकते हैं।
अदालत ने युवाओं की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को स्वीकार करते हुए यह संदेश दिया कि अपनी बात रखना अधिकार है, लेकिन उस अधिकार का इस्तेमाल जिम्मेदारी के साथ किया जाना चाहिए। सीजेपी नेताओं की ओर से विवादित पोस्ट 24 घंटे के भीतर हटाने का आश्वासन दिया गया है। वहीं, गौरव भाटिया की ओर से भविष्य में इस तरह की पोस्ट पर रोक लगाने की मांग की गई है। इस मामले में अंतरिम राहत को लेकर हाईकोर्ट का रुख आगे की सुनवाई में स्पष्ट होगा।


