नई दिल्ली: नेपाल में हाल में सामने आई विनाशकारी प्राकृतिक आपदा ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्रों में बढ़ते आपदा जोखिम को लेकर चिंता बढ़ा दी है। पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन, अचानक आने वाली बाढ़, बादल फटने और दूसरी प्राकृतिक घटनाओं से बड़े स्तर पर जान-माल का नुकसान होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के हिमालयी राज्यों में भी इस तरह की घटनाओं का खतरा लगातार बना हुआ है।

ऐसे समय में भौगोलिक सूचना प्रणाली यानी GIS मैपिंग आपदा प्रबंधन का एक प्रभावी माध्यम बन सकती है। GIS तकनीक के जरिए किसी इलाके की भौगोलिक स्थिति, जमीन की बनावट, जल स्रोत, सड़कें, आबादी और पहले हो चुकी प्राकृतिक घटनाओं से जुड़ी जानकारी को एक ही डिजिटल मैप पर देखा और उसका विश्लेषण किया जा सकता है। इससे संभावित खतरे वाले इलाकों की पहचान करने और समय रहते प्रशासन को अलर्ट करने में मदद मिल सकती है।

इसी दिशा में एसरी इंडिया ने गुरुवार को अपना लिनक्स आधारित डेस्कटॉप GIS सॉफ्टवेयर जिओसरल (GeoSURL) लॉन्च किया है। कंपनी के मुताबिक, यह स्वदेशी GIS सॉफ्टवेयर देश में मैपिंग और लोकेशन इंटेलिजेंस से जुड़े कामों को और आसान बनाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। कंपनी जल्द ही इसका एंड्रायड आधारित वर्जन भी पेश करने की तैयारी में है।

आपदा आने से पहले कैसे मिलेगी जानकारी?

GIS तकनीक की मदद से किसी क्षेत्र का डिजिटल मैप तैयार कर वहां मौजूद जोखिमों का आकलन किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, किसी पहाड़ी इलाके में जहां जमीन का ढलान ज्यादा है और पहले भी भूस्खलन हो चुका है, उस क्षेत्र को हाई रिस्क जोन के तौर पर चिन्हित किया जा सकता है।

इसी तरह नदी और नालों के आसपास के इलाकों की मैपिंग करके बाढ़ की संभावित स्थिति का अनुमान लगाने में मदद मिल सकती है। बारिश का डेटा, जमीन की स्थिति, जल निकासी व्यवस्था और पुराने बाढ़ रिकॉर्ड जैसी जानकारियों को एक साथ देखने से प्रशासन को यह समझने में आसानी हो सकती है कि किन इलाकों में खतरा ज्यादा है।

इसका फायदा यह होगा कि किसी आपदा के पूरी तरह सामने आने से पहले ही संवेदनशील इलाकों की पहचान की जा सके। जरूरत पड़ने पर वहां रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने, रास्ते बंद करने या राहत टीमों को पहले से तैयार रखने जैसे फैसले तेजी से लिए जा सकते हैं। राहत और बचाव में भी आएगा काम GIS का इस्तेमाल केवल आपदा से पहले निगरानी तक सीमित नहीं रहेगा। आपदा आने के बाद भी यह तकनीक राहत और बचाव अभियान को व्यवस्थित करने में मदद कर सकती है।

मान लीजिए किसी इलाके में भारी बारिश के बाद सड़कें टूट गईं या भूस्खलन के कारण रास्ता बंद हो गया। GIS मैप के जरिए प्रशासन को वैकल्पिक रास्तों, नजदीकी अस्पतालों, राहत केंद्रों और प्रभावित गांवों की लोकेशन एक साथ देखने में मदद मिल सकती है। इससे राहत सामग्री पहुंचाने वाली टीमों को बेहतर रूट चुनने और प्रभावित इलाकों तक जल्दी पहुंचने में मदद मिलेगी। बड़े स्तर की आपदा की स्थिति में अलग-अलग एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल बनाने में भी मैपिंग तकनीक उपयोगी साबित हो सकती है।

भारत में पहली बार लॉन्च हुआ जिओसरल

एसरी इंडिया के मुताबिक, जिओसरल को फिलहाल लिनक्स आधारित डेस्कटॉप GIS सॉफ्टवेयर के रूप में पेश किया गया है। कंपनी का कहना है कि इसे भारतीय जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है। इसके जरिए यूजर्स मैपिंग, लोकेशन डेटा और भौगोलिक जानकारी का इस्तेमाल कर अलग-अलग क्षेत्रों का विश्लेषण कर सकेंगे। कंपनी आने वाले समय में जिओसरल का एंड्रायड वर्जन भी लॉन्च करेगी। इससे फील्ड में काम करने वाले कर्मचारियों और आपदा प्रबंधन से जुड़ी टीमों के लिए मौके पर ही लोकेशन आधारित जानकारी जुटाना और उसका इस्तेमाल करना आसान हो सकता है।

हिमालयी राज्यों के लिए क्यों जरूरी है ऐसी तकनीक?

भारत का हिमालयी क्षेत्र प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जाता है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, सिक्किम और पूर्वोत्तर के कई पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन, बाढ़ और दूसरी प्राकृतिक घटनाएं समय-समय पर सामने आती रहती हैं।कई बार समस्या यह होती है कि किसी इलाके में आपदा आने के बाद यह पता लगाने में समय लग जाता है कि सबसे ज्यादा नुकसान कहां हुआ है और राहत टीमों को किस रास्ते से भेजा जाए। GIS आधारित सिस्टम इस प्रक्रिया को तेज कर सकता है। एक ही मैप पर अलग-अलग तरह की जानकारी उपलब्ध होने से अधिकारियों को मौके की स्थिति समझने और फैसले लेने में मदद मिल सकती है।

तकनीक के साथ स्थानीय जानकारी भी जरूरी

केवल GIS मैपिंग के भरोसे आपदाओं को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता। मौसम की स्थिति, स्थानीय प्रशासन की तैयारी, समय पर चेतावनी, लोगों की जागरूकता और राहत-बचाव व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है। GIS इन सभी प्रयासों को बेहतर तरीके से जोड़ने का काम कर सकता है। एसरी इंडिया के प्रबंध निदेशक अगेन्द्र कुमार ने कहा कि कंपनी का फोकस ग्राहकों की जरूरतों को समझते हुए नई तकनीक उपलब्ध कराने पर है। उनके मुताबिक, जिओसरल की लॉन्चिंग भारत में GIS तकनीक के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक कदम है।

कुल मिलाकर, अगर GIS आधारित मैपिंग को मौसम और आपदा से जुड़े दूसरे डेटा के साथ प्रभावी तरीके से जोड़ा जाए, तो हिमालयी क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन की तैयारी को काफी मजबूत किया जा सकता है। इससे खतरे वाले इलाकों की पहचान से लेकर चेतावनी जारी करने और आपदा के बाद राहत पहुंचाने तक, पूरी प्रक्रिया को ज्यादा तेज और व्यवस्थित बनाने में मदद मिल सकती है।

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