इस समय ‘कॉकरोच जनता पार्टी (CJP)’ चर्चा में बनी हुई है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के एक बयान के बाद ‘कॉकरोच’ शब्द को लेकर सोशल मीडिया और सार्वजनिक बहसों में खासा ध्यान आकर्षित हुआ है। ‘कॉकरोच’ टिप्पणी के बाद इस पर लोगों की प्रतिक्रियाएं तेज़ हो गईं और कई स्तरों पर असहमति भी देखने को मिली। इसके बाद अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ की शुरुआत की घोषणा कर दी, जिसके बाद उनके अकाउंट्स पर फॉलोअर्स की संख्या तेजी से बढ़ने लगी। बताया जा रहा है कि कुछ ही घंटों में उनके इंस्टाग्राम फॉलोअर्स में जबरदस्त उछाल आया और यह चर्चा बड़े राजनीतिक दलों तक को पीछे छोड़ने लगी। हालांकि, इन आंकड़ों से अलग हटकर असली बहस यह है कि इस तरह के आंदोलन के प्रति बढ़ती दिलचस्पी आखिर क्या संकेत देती है। क्या यह मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था और सत्ताधारी दलों के खिलाफ बढ़ते असंतोष का संकेत है, या फिर लोग एक नए विकल्प की तलाश में हैं? क्या यह किसी नए राजनीतिक आंदोलन की शुरुआत हो सकती है? इन सवालों के जवाब अभी स्पष्ट नहीं हैं, क्योंकि ऐसे बदलाव और आंदोलन समय के साथ ही अपनी दिशा तय करते हैं।

यह ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ अभी हाल ही में चर्चा में आई है, इसलिए इसका कोई औपचारिक ढांचा, संगठन या पदाधिकारियों की व्यवस्था तय नहीं हुई है। फिलहाल यह भी स्पष्ट नहीं है कि यह आने वाले समय में चुनावी राजनीति में उतरने की योजना रखती है या नहीं। इसी वजह से लोग यह जानने को उत्सुक हैं कि क्या यह केवल एक सोशल मीडिया ट्रेंड है या फिर यह वास्तव में किसी राजनीतिक दल के रूप में आगे बढ़ेगी। पिछले करीब एक दशक में भारत सहित कई देशों में देखा गया है कि सोशल मीडिया से शुरू हुए ऐसे कई गैर-पारंपरिक आंदोलन, जिनमें युवा और राजनीति से दूर लोग शामिल रहे, धीरे-धीरे बड़े जनसमर्थन में बदल गए। कुछ मामलों में तो इन आंदोलनों ने स्थापित राजनीतिक दलों को चुनौती दी और चुनावी राजनीति में भी अप्रत्याशित नतीजे दिए।
कुछ मामलों में ऐसे आंदोलनों का असर लंबे समय तक बना रहा, जबकि कुछ सिर्फ कुछ समय के लिए ही चर्चा में रहे। फिलहाल ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को लेकर जो चर्चा हो रही है, उसके संदर्भ में हाल के वर्षों में ऐसे उदाहरणों पर नजर डालना जरूरी हो जाता है, जो सोशल मीडिया से शुरू होकर राजनीतिक प्रभाव तक पहुंचे। यह भी समझना अहम है कि उन आंदोलनों के फैलने के पीछे कौन-से सामाजिक और राजनीतिक कारण थे। चूंकि ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ भारत से जुड़ी चर्चा में है, इसलिए भारत के ही कुछ उदाहरणों से इसकी शुरुआत को समझा जा सकता है।
भारत: भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से लेकर आम आदमी पार्टी के उदय तक
2011 में Anna Hazare का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन उस समय की कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान शुरू हुआ था, जो धीरे-धीरे पूरे देश में फैल गया। उस दौर में सोशल मीडिया आज जितना प्रभावशाली नहीं था, लेकिन इसके बावजूद इस आंदोलन ने भारतीय राजनीति पर गहरा असर डालना शुरू कर दिया था।अन्ना हजारे ने दिल्ली के रामलीला मैदान में ‘जन लोकपाल विधेयक’ की मांग को लेकर अनशन और आंदोलन का नेतृत्व किया, जिसने बड़ी संख्या में लोगों का ध्यान आकर्षित किया।
यह विरोध प्रदर्शन उस समय सामने आए कथित 2G स्पेक्ट्रम घोटाले और अन्य भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर शुरू हुआ था। माना जाता है कि इस व्यापक जनअसंतोष ने भारत में 2014 के राजनीतिक बदलाव की पृष्ठभूमि तैयार करने में भूमिका निभाई। इसी आंदोलन से प्रेरित होकरअरविंद केजरीवाल ने 2012 में आम आदमी पार्टी की स्थापना की। हालांकि, उनके कुछ साथियों ने राजनीति में उतरने के फैसले का विरोध भी किया था। इसके बावजूद पार्टी ने जल्द ही चुनावी राजनीति में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई।2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में ‘आप’ ने 70 में से 67 सीटें जीतकर भारी बहुमत हासिल किया और सरकार बनाई। इसके बाद 2020 में भी पार्टी ने सत्ता बरकरार रखी। 2022 में पंजाब जैसे बड़े राज्य में जीत हासिल कर इसने राजनीतिक हलकों को चौंका दिया। वहीं गुजरात और गोवा जैसे राज्यों में भी पार्टी ने धीरे-धीरे अपना विस्तार किया। पिछले कुछ वर्षों में अरविंद केजरीवाल की पार्टी आम आदमी पार्टी (AAP) की सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे हैं। इन मामलों में मनीष सिसोदिया सहित पार्टी के कुछ प्रमुख नेताओं को कानूनी कार्रवाई और जेल की स्थिति का सामना करना पड़ा। हालांकि पार्टी लगातार इन आरोपों को राजनीतिक साजिश बताती रही है। 2025 में आम आदमी पार्टी को दिल्ली में सत्ता से हाथ धोना पड़ा। जिस भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से इसकी शुरुआत हुई थी, वह अब पहले जैसा संगठित नहीं रहा है और पार्टी खुद भी एक कठिन और चुनौतीपूर्ण राजनीतिक दौर से गुजर रही है।
2009 में इटली में एक ऐसे आंदोलन की शुरुआत हुई, जिसने बाद में वहां की राजनीति में एक नया विकल्प तैयार कर दिया। इसकी अगुवाई हास्य ब्लॉगर Beppe Grillo ने की थी। दरअसल, उन्होंने 2005 से ही ‘मीटअप’ जैसे सोशल नेटवर्किंग प्लेटफॉर्म के जरिए लोगों को जोड़ना शुरू कर दिया था। समान सोच रखने वाले लोग नियमित रूप से मिलते और पर्यावरण व नीतिगत सुधारों जैसे मुद्दों पर चर्चा करते थे। धीरे-धीरे इस पहल को लोगों का अच्छा समर्थन मिलने लगा। इसके बाद 2007 में उन्होंने अपने ब्लॉग के जरिए भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था के खिलाफ एक व्यंग्यात्मक अभियान ‘वी-डे’ शुरू किया। इस कदम ने स्वच्छ और पारदर्शी राजनीति की मांग को और तेज कर दिया, जिसमें आपराधिक या भ्रष्ट पृष्ठभूमि वाले नेताओं को संसद से बाहर रखने और चुनावी सुधारों की मांग शामिल थी।बढ़ते समर्थन के बीच 2009 में Beppe Grillo ने सक्रिय राजनीति में उतरने का फैसला किया और इंटरनेट के जरिए लोगों को जोड़ते हुए ‘फाइव स्टार मूवमेंट’ (M5S) की स्थापना की।


