सऊदी-पाक: पश्चिम एशिया में तेजी से बदल रहे सुरक्षा समीकरणों के बीच पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच हुआ मक्का संयुक्त रक्षा समझौता चर्चा में है। शुक्रवार को हुए इस समझौते को तीनों देशों के बीच रक्षा सहयोग बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। समझौते की सबसे अहम बात यह है कि अगर तीनों में से किसी एक देश पर हमला होता है, तो उसे सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाएगा। यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब पश्चिम एशिया में सुरक्षा को लेकर पहले से ही तनाव का माहौल है।
ईरान के साथ जारी संघर्ष और अमेरिका की सुरक्षा गारंटी को लेकर खाड़ी देशों में बढ़ती अनिश्चितता ने इन देशों को अपनी सुरक्षा व्यवस्था को लेकर नए विकल्प तलाशने के लिए मजबूर किया है। ऐसे में पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की का एक साझा रक्षा ढांचा बनाना आने वाले समय में क्षेत्रीय राजनीति को प्रभावित कर सकता है।
पाकिस्तान के लिए क्यों अहम है यह समझौता?
पाकिस्तान लंबे समय से सऊदी अरब के साथ रक्षा और सैन्य संबंध मजबूत करता रहा है। वहीं तुर्की के साथ भी इस्लामाबाद के रिश्ते काफी करीबी हैं। ऐसे में इन दोनों ताकतवर देशों के साथ एक औपचारिक सुरक्षा समझौता पाकिस्तान को पश्चिम एशिया में अपनी रणनीतिक भूमिका बढ़ाने का मौका दे सकता है।
पाकिस्तान इस समझौते को सिर्फ तीन देशों तक सीमित रखने के बजाय आने वाले समय में दूसरे अरब देशों को भी इसके साथ जोड़ने की कोशिश कर सकता है। अगर ऐसा होता है तो यह एक बड़ा क्षेत्रीय सुरक्षा नेटवर्क बन सकता है, जिसका असर पश्चिम एशिया के साथ-साथ दक्षिण एशिया की राजनीति पर भी पड़ सकता है।
भारत के लिए चिंता की वजह क्या है?
भारत के लिए चिंता मुख्य रूप से पाकिस्तान के इस समझौते का इस्तेमाल अपने रणनीतिक हितों के लिए करने की संभावित कोशिश को लेकर है। पाकिस्तान पहले भी अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के खिलाफ समर्थन जुटाने की कोशिश करता रहा है। अब अगर इस नए रक्षा ढांचे का विस्तार होता है और इसमें कुछ अन्य अरब देश शामिल होते हैं, तो पाकिस्तान को भारत के खिलाफ कूटनीतिक दबाव बनाने के लिए ज्यादा मंच मिल सकते हैं।
खासकर कश्मीर जैसे मुद्दों पर पाकिस्तान इन देशों का समर्थन हासिल करने की कोशिश कर सकता है। हालांकि, सिर्फ इस समझौते के आधार पर यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि सऊदी अरब या तुर्की भारत के खिलाफ किसी सैन्य कार्रवाई में पाकिस्तान का साथ देंगे। दोनों देशों के भारत के साथ भी अपने अलग आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं।
क्या पाकिस्तान इसे भारत के खिलाफ इस्तेमाल कर सकता है?
यही सवाल इस पूरे समझौते को भारत के नजरिए से अहम बनाता है। रक्षा समझौते की भाषा मुख्य तौर पर सदस्य देशों की सुरक्षा से जुड़ी है। अगर पाकिस्तान भविष्य में भारत के साथ किसी सैन्य तनाव को इस समझौते के दायरे में लाने की कोशिश करता है, तो स्थिति काफी जटिल हो सकती है। मसलन, पाकिस्तान किसी घटना को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताते हुए अपने सहयोगी देशों से राजनीतिक या कूटनीतिक समर्थन मांग सकता है।
किसी सदस्य देश पर बाहरी हमला और किसी देश के साथ द्विपक्षीय विवाद के बीच अंतर होता है। इसलिए हर स्थिति में समझौते के तहत सैन्य मदद मिलना तय नहीं माना जा सकता। फिर भी भारत के लिए असली चिंता इस समझौते के संभावित विस्तार और पाकिस्तान की कूटनीतिक सक्रियता को लेकर है।
पश्चिम एशिया में क्यों बन रहा है नया सुरक्षा समीकरण?
पिछले कुछ समय से पश्चिम एशिया के देशों में यह चिंता बढ़ी है कि क्षेत्रीय संकट की स्थिति में बाहरी शक्तियों पर पूरी तरह निर्भर रहना कितना सुरक्षित है। ईरान के साथ तनाव और क्षेत्र में लगातार बदलती परिस्थितियों ने इस बहस को और तेज कर दिया है। खाड़ी देशों के लिए अपनी सुरक्षा को लेकर एक ऐसी व्यवस्था बनाना जरूरी हो गया है जिसमें वे सिर्फ किसी एक बाहरी शक्ति की सुरक्षा गारंटी पर निर्भर न रहें। इसी सोच के बीच क्षेत्रीय देशों के बीच रक्षा सहयोग बढ़ाने की कोशिशें तेज हुई हैं। मक्का समझौते को इसी बड़े बदलाव के हिस्से के तौर पर देखा जा रहा है।
सऊदी अरब के लिए भी है रणनीतिक महत्व
सऊदी अरब इस समझौते का सबसे अहम पक्ष है। देश लंबे समय से अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका समेत पश्चिमी देशों के साथ सहयोग करता रहा है, लेकिन बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच रियाद अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता भी बढ़ाना चाहता है। तुर्की एक बड़ी क्षेत्रीय सैन्य ताकत है, जबकि पाकिस्तान के पास भी एक मजबूत सैन्य ढांचा और परमाणु क्षमता है। ऐसे में दोनों देशों के साथ रक्षा सहयोग सऊदी अरब को क्षेत्रीय सुरक्षा के लिहाज से अतिरिक्त विकल्प दे सकता है।
तुर्की की भूमिका भी महत्वपूर्ण
तुर्की पहले से ही पश्चिम एशिया और मुस्लिम दुनिया में अपनी रणनीतिक भूमिका मजबूत करने की कोशिश करता रहा है। पाकिस्तान और सऊदी अरब के साथ उसका रक्षा सहयोग इस भूमिका को और मजबूत कर सकता है। तुर्की के पास आधुनिक सैन्य तकनीक और ड्रोन से लेकर कई तरह की रक्षा क्षमताएं हैं। पाकिस्तान के साथ उसके रक्षा संबंध भी लगातार बढ़े हैं। ऐसे में तीनों देशों का साथ आना केवल राजनीतिक संदेश नहीं, बल्कि सैन्य सहयोग के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भारत को क्या करना होगा?
भारत के लिए इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अहम पहलू यह होगा कि वह पश्चिम एशिया में अपने मौजूदा रिश्तों को और मजबूत करे। भारत के सऊदी अरब, यूएई, कतर और दूसरे खाड़ी देशों के साथ मजबूत आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं। भारत के लिए चुनौती यह होगी कि पाकिस्तान इस नए सुरक्षा ढांचे का इस्तेमाल भारत के खिलाफ राजनीतिक नैरेटिव तैयार करने के लिए न कर पाए।
इसके लिए नई दिल्ली को खाड़ी देशों के साथ अपने रणनीतिक संवाद को और मजबूत करना होगा। भारत को यह भी ध्यान रखना होगा कि पश्चिम एशिया के अधिकांश देश अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हैं। इसलिए पाकिस्तान, सऊदी अरब और तुर्की के बीच समझौता अपने आप में भारत के खिलाफ कोई गठबंधन नहीं है।
क्या यह भारत-पाकिस्तान के बीच नया मोर्चा खोल सकता है?
ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। मक्का संयुक्त रक्षा समझौता मुख्य रूप से सदस्य देशों की सामूहिक सुरक्षा पर केंद्रित है। लेकिन अगर भविष्य में पाकिस्तान इसे भारत के साथ अपने विवादों के संदर्भ में इस्तेमाल करने की कोशिश करता है, तो भारत के लिए यह एक नई कूटनीतिक चुनौती जरूर बन सकती है। खासकर तब, जब इस ढांचे में और देश शामिल होते हैं। जितने ज्यादा देश किसी साझा सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा बनेंगे, पाकिस्तान के पास उतने ही ज्यादा कूटनीतिक विकल्प हो सकते हैं।
भारत के लिए असली चुनौती समझौता नहीं, उसका संभावित विस्तार
मक्का रक्षा समझौते का सीधा असर भारत की सुरक्षा पर पड़ने की संभावना फिलहाल स्पष्ट नहीं है। लेकिन भारत को नजर इस बात पर रखनी होगी कि पाकिस्तान आगे इस समझौते को किस तरह इस्तेमाल करता है और क्या दूसरे अरब देश भी इस सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ते हैं। अगर पाकिस्तान इस पहल को व्यापक मुस्लिम देशों के सुरक्षा नेटवर्क में बदलने में सफल होता है, तो दक्षिण एशिया की रणनीतिक राजनीति पर इसका असर पड़ सकता है। ऐसे में भारत के लिए पश्चिम एशिया में अपनी कूटनीतिक पकड़ बनाए रखना और खाड़ी देशों के साथ भरोसेमंद रणनीतिक रिश्ते मजबूत करना पहले से ज्यादा जरूरी हो जाएगा।


