MathuraNews : वृंदावन के बांकेबिहारी मंदिर के लाल बलुआ पत्थरों पर वर्षों पहले चढ़ाई गई पॉलीमर कोटिंग अब संरचना के लिए परेशानी बन गई थी। इस परत की वजह से पत्थरों के भीतर नमी बाहर नहीं निकल पा रही थी, जिससे दीवारों की मजबूती प्रभावित होने लगी। स्थिति को देखते हुए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की विज्ञान शाखा ने विशेष वैज्ञानिक प्रक्रिया शुरू की है। इसके तहत पॉलीमर की परत को सावधानीपूर्वक हटाकर पत्थरों का केमिकल ट्रीटमेंट किया जा रहा है, ताकि मंदिर की मूल संरचना सुरक्षित रहे और उसकी उम्र बढ़ाई जा सके। श्रीबांकेबिहारी मंदिर की संरचना केवल कमजोर नींव के कारण ही प्रभावित नहीं हो रही थी, बल्कि दीवारों पर पहले किए गए पेंट और पॉलीमर कोटिंग ने भी पत्थरों को नुकसान पहुंचाया। इस परत के कारण लाल बलुआ पत्थरों के भीतर नमी फंस रही थी और वे प्राकृतिक रूप से “सांस” नहीं ले पा रहे थे, जिससे उनकी मजबूती पर असर पड़ रहा था। मंदिर की स्थिति का आकलन करने के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने विस्तृत सर्वे कर अपनी रिपोर्ट हाईपावर कमेटी को सौंपी। इसके साथ ही एएसआई की विज्ञान शाखा के विशेषज्ञ मंदिर की दीवारों के संरक्षण कार्य में सहयोग कर रहे हैं। वैज्ञानिक प्रक्रिया के तहत दीवारों पर जमी पॉलीमर की परत हटाई जा रही है और विशेष केमिकल ट्रीटमेंट किया जा रहा है, जिससे पत्थरों की गुणवत्ता सुरक्षित रहे और मंदिर की आयु बढ़ सके। वृंदावन के ठाकुर श्रीबांकेबिहारी मंदिर का निर्माण लाल बलुई पत्थर से किया गया है। वर्ष 1864 में लाल पत्थर से बने मंदिर की दीवारों पर पॉलीमर की परत चढ़ा दी गई थी। सर्वेक्षण में एएसआई ने इसे मंदिर की सेहत के लिए खराब बताया। इसके बाद एएसआई की विज्ञान शाखा से सहयोग मांगा गया। आगरा सर्किल के एएसआई विज्ञान शाखा के अधिकारियों की टीम ने हाईपावर कमेटी के निर्देश पर केमिकल ट्रीटमेंट कराने का काम शुरू कराया। विशेषज्ञों की सलाह से मंदिर की दीवारों से पॉलीमर की परत हटवाई जा रही है। अन्य हिस्सों की वैज्ञानिक ढंग से सफाई के बाद यहां पत्थर के अनुकूल रिवर्सिबल कोटिंग कराई जा रही है। मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार के ऊपरी हिस्से के साथ दीवारों का ट्रीटमेंट हो चुका है। कुछ काम बाकी है। ट्रीटमेंट से लाल पत्थर की उम्र बढ़ेगी, जबकि पॉलीमर पेंट से नुकसान पहुंच रहा था।

लाल पत्थरों का दम घुटा तो जर्जर होने लगीं मंदिर की दीवारें

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के पूर्व इंजीनियर एम.सी. शर्मा के अनुसार लाल बलुआ पत्थर स्वाभाविक रूप से छिद्रयुक्त होता है, जिससे वह हवा और नमी का आदान-प्रदान कर पाता है। लेकिन जब इसकी सतह पर पॉलीमर या सिंथेटिक पेंट की परत चढ़ा दी जाती है, तो पत्थर की यह प्राकृतिक क्षमता प्रभावित हो जाती है। ऐसी कोटिंग के कारण पत्थर के भीतर नमी फंस जाती है, जो समय के साथ दबाव बनाकर सतह पर पपड़ी और दरारें पैदा करती है। तेज धूप और गर्मी में यही नमी भाप में बदलकर पत्थर की आंतरिक मजबूती को कमजोर करने लगती है। इसके अलावा, पॉलीमर युक्त परत अल्ट्रावायलेट किरणों के प्रभाव से पीली या भूरी पड़ जाती है, जिससे लाल बलुआ पत्थर का मूल रंग और सौंदर्य भी प्रभावित होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ प्रकार के पॉलीमर पत्थर में मौजूद खनिज तत्वों के साथ रासायनिक प्रतिक्रिया कर उसकी संरचना को अंदर से नुकसान पहुंचा सकते हैं, जिससे पत्थर धीरे-धीरे खोखला और कमजोर होने लगता है।

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