Russian oil: भारत द्वारा रूस से कच्चे तेल की खरीद जारी रखने को लेकर अमेरिका में एक बार फिर सियासी और आर्थिक बहस तेज हो गई है। अमेरिकी सीनेट में दोनों प्रमुख दलों (रिपब्लिकन और डेमोक्रेट) के कुछ सांसदों ने एक ऐसा बिल पेश किया है, जिसमें भारत सहित पांच देशों से अमेरिका आने वाले सामान पर 100 प्रतिशत तक आयात शुल्क लगाने का प्रस्ताव रखा गया है। इस प्रस्ताव के सामने आने के बाद भारत में भी राजनीतिक हलचल बढ़ गई है। इसी मुद्दे को लेकर कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर सवाल उठाए हैं और केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल से इस पूरे मामले पर सरकार का आधिकारिक रुख स्पष्ट करने की मांग की है। पार्टी का कहना है कि यह मामला सिर्फ व्यापार का नहीं बल्कि भारत की विदेश नीति, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हितों से भी जुड़ा हुआ है। Russian oil
कांग्रेस ने पूछा- क्या सरकार इस खतरे को गंभीरता से ले रही है?
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि अगर अमेरिका वास्तव में ऐसा कानून लागू करता है तो इसका सीधा असर भारतीय निर्यात पर पड़ सकता है। अमेरिका भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में शामिल है और ऐसे में 100 प्रतिशत टैरिफ लगने से भारतीय कंपनियों के लिए अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा करना बेहद मुश्किल हो जाएगा। पार्टी ने सरकार से पूछा कि क्या इस मुद्दे पर अमेरिका से कोई औपचारिक बातचीत हुई है? क्या भारत सरकार इस संभावित खतरे को लेकर कोई रणनीति तैयार कर रही है? और यदि हालात बिगड़ते हैं तो भारतीय उद्योगों और निर्यातकों को बचाने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे? Russian oil
रूस से तेल खरीदना क्यों बना विवाद का कारण?
रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे। इसके बावजूद भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए रूस से रियायती दरों पर कच्चे तेल की खरीद जारी रखी। भारत का तर्क हमेशा यही रहा है कि देश की पहली प्राथमिकता अपने नागरिकों को सस्ती ऊर्जा उपलब्ध कराना और ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखना है। भारत का कहना है कि वह किसी भी देश के दबाव में अपनी ऊर्जा नीति तय नहीं करेगा और राष्ट्रीय हित सर्वोपरि रहेगा। इसी वजह से रूस से तेल खरीद को लेकर समय-समय पर अमेरिका और यूरोपीय देशों की ओर से सवाल उठते रहे हैं। Russian oil
अगर लागू हुआ 100% टैरिफ तो क्या होगा असर?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह प्रस्ताव कानून बन जाता है तो भारत से अमेरिका भेजे जाने वाले कई उत्पाद महंगे हो सकते हैं। इससे टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग गुड्स, ऑटो पार्ट्स, केमिकल, फार्मास्यूटिकल्स, जेम्स एंड ज्वेलरी और अन्य निर्यात क्षेत्रों को बड़ा झटका लग सकता है। भारतीय कंपनियों की लागत बढ़ने से अमेरिका में उनकी प्रतिस्पर्धा कमजोर पड़ सकती है, जिसका असर निर्यात, निवेश और रोजगार पर भी देखने को मिल सकता है। हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि किसी भी बिल के कानून बनने से पहले कई संसदीय प्रक्रियाओं और राजनीतिक चर्चाओं से गुजरना पड़ता है। Russian oil
भारत-अमेरिका व्यापारिक रिश्तों पर भी उठे सवाल
भारत और अमेरिका के बीच पिछले कुछ वर्षों में व्यापारिक संबंध लगातार मजबूत हुए हैं। दोनों देश रक्षा, टेक्नोलॉजी, सेमीकंडक्टर, ऊर्जा और निवेश जैसे कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा रहे हैं। ऐसे समय में इस तरह का प्रस्ताव दोनों देशों के आर्थिक रिश्तों के लिए नई चुनौती पैदा कर सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों देशों के बीच बातचीत के जरिए समाधान निकालने की कोशिश की जाएगी, क्योंकि भारत और अमेरिका दोनों ही एक-दूसरे के लिए रणनीतिक साझेदार हैं। Russian oil
सरकार की प्रतिक्रिया का इंतजार
फिलहाल केंद्र सरकार की ओर से इस प्रस्ताव पर विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि माना जा रहा है कि विदेश मंत्रालय और वाणिज्य मंत्रालय पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं। आने वाले दिनों में भारत इस मुद्दे को कूटनीतिक स्तर पर अमेरिका के सामने उठा सकता है। दूसरी ओर कांग्रेस लगातार सरकार से स्पष्ट जवाब मांग रही है कि यदि अमेरिका का यह प्रस्ताव आगे बढ़ता है तो भारत की रणनीति क्या होगी और देश के व्यापारिक हितों की रक्षा किस तरह की जाएगी। Russian oil
अमेरिकी सीनेट में पेश किया गया यह बिल अभी शुरुआती चरण में है और इसे कानून बनने से पहले कई प्रक्रियाओं से गुजरना होगा। लेकिन इस प्रस्ताव ने भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों और रूस से तेल खरीद की नीति को लेकर नई बहस जरूर छेड़ दी है। अब सभी की नजर केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया और दोनों देशों के बीच होने वाली संभावित बातचीत पर टिकी हुई है। आने वाले समय में यह मुद्दा न सिर्फ आर्थिक बल्कि कूटनीतिक और राजनीतिक स्तर पर भी काफी अहम साबित हो सकता है। Russian oil

