Trump Administration: रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर अमेरिका अब एक बार फिर सख्त रुख अपनाने की तैयारी में है। अमेरिकी संसद (सीनेट) के चार प्रभावशाली सांसदों ने ट्रंप प्रशासन के साथ मिलकर रूस पर नए प्रतिबंधों से जुड़ा कानून आगे बढ़ाने का फैसला किया है। अगर यह कानून लागू होता है तो इसका असर सिर्फ रूस तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उन देशों पर भी पड़ सकता है जो आज भी रूस से तेल, गैस, यूरेनियम और दूसरे पेट्रोलियम उत्पाद खरीद रहे हैं। इनमें भारत का नाम भी प्रमुख देशों में शामिल है।
भारत पिछले कुछ वर्षों में रूस से बड़ी मात्रा में सस्ता कच्चा तेल खरीद रहा है। ऐसे में अमेरिका की यह नई पहल भारत के लिए आर्थिक और कूटनीतिक दोनों स्तर पर चुनौती पैदा कर सकती है। Trump Administration
चार अमेरिकी सांसदों ने ट्रंप प्रशासन के साथ बनाई रणनीति
इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने वाले चार सांसदों में दो रिपब्लिकन और दो डेमोक्रेट सीनेटर शामिल हैं। इनमें डोनाल्ड ट्रंप के करीबी माने जाने वाले सीनेटर लिंडसे ग्राहम भी शामिल हैं।सांसदों ने एक संयुक्त बयान जारी करते हुए कहा कि रूस लगातार यूक्रेन में आम नागरिकों पर हमले कर रहा है। ऐसे में सिर्फ रूस पर ही नहीं, बल्कि उसकी ऊर्जा खरीदकर उसकी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाले देशों पर भी दबाव बनाया जाना जरूरी है। उनका कहना है कि अब अमेरिका की कार्यपालिका और संसद मिलकर ऐसे कदम उठाएंगे जिससे रूस को आर्थिक रूप से बड़ा झटका दिया जा सके। Trump Administration
क्या है नया रूस प्रतिबंध कानून?
जिस कानून पर चर्चा हो रही है उसे “Sanctioning Russia Act” के नाम से जाना जा रहा है। इस प्रस्ताव का मकसद रूस की सबसे बड़ी कमाई यानी ऊर्जा कारोबार पर चोट करना है।
अगर कोई देश रूस से—
कच्चा तेल खरीदता है,
प्राकृतिक गैस खरीदता है,
यूरेनियम खरीदता है,
पेट्रोलियम उत्पाद खरीदता है, तो अमेरिका उस देश से आने वाले सामान और सेवाओं पर भारी टैरिफ यानी अतिरिक्त आयात शुल्क लगा सकता है।पहले इस बिल में 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव रखा गया था, जिसे कुछ सांसदों ने “बोन क्रशिंग” यानी बेहद कड़ा आर्थिक कदम बताया था। Trump Administration
500% टैरिफ कितना बड़ा झटका हो सकता है?
अगर किसी देश पर 500 प्रतिशत तक का अमेरिकी टैरिफ लागू होता है तो उस देश के लिए अमेरिका को निर्यात करना काफी महंगा हो जाएगा।
इसका असर कई सेक्टरों पर पड़ सकता है जैसे—
-फार्मा उद्योग
-इंजीनियरिंग सामान
-ऑटो पार्ट्स
-स्टील और मेटल
-टेक्सटाइल आईटी से जुड़ी कुछ सेवाएं
हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि संशोधित बिल में 500 प्रतिशत वाला प्रावधान उसी रूप में रहेगा या उसमें बदलाव किया जाएगा। Trump Administration
भारत क्यों है चर्चा में?
रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद पश्चिमी देशों ने रूस से तेल खरीदना काफी हद तक कम कर दिया था। इसी दौरान भारत ने अंतरराष्ट्रीय बाजार की तुलना में सस्ते दामों पर रूसी कच्चा तेल खरीदना शुरू किया।आज भारत रूस से बड़ी मात्रा में क्रूड ऑयल आयात करता है। इस तेल को भारतीय रिफाइनरियां प्रोसेस करके घरेलू जरूरतों के साथ-साथ कई देशों को निर्यात भी करती हैं।यही वजह है कि अगर अमेरिका रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर सख्ती करता है तो भारत भी उसकी नजर में आ सकता है। Trump Administration
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क्या भारत पर तुरंत प्रतिबंध लग जाएगा? प्रस्तावित कानून में अमेरिकी राष्ट्रपति को यह अधिकार भी दिया गया है कि वह किसी देश को 180 दिनों तक छूट (Waiver) दे सकते हैं।अगर अमेरिकी राष्ट्रपति को लगता है कि किसी देश को राहत देना अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है तो वह अस्थायी तौर पर उस देश को प्रतिबंधों से बाहर रख सकते हैं।यानी भारत के मामले में अंतिम फैसला काफी हद तक अमेरिकी प्रशासन और दोनों देशों के रणनीतिक संबंधों पर निर्भर करेगा। Trump Administration
बिल में बदलाव की भी खबर
अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस बिल में कुछ बदलाव किए गए हैं। खास तौर पर 500 प्रतिशत वाले टैरिफ को लेकर नियमों को थोड़ा नरम करने पर चर्चा हुई है।हालांकि संशोधित बिल का अंतिम ड्राफ्ट अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है। इसलिए यह साफ नहीं है कि किन देशों पर कितना टैरिफ लगाया जाएगा और किन परिस्थितियों में छूट मिलेगी। Trump Administration
भारत-अमेरिका रिश्तों पर क्या असर पड़ सकता है?
भारत और अमेरिका पिछले कुछ वर्षों में रक्षा, व्यापार, टेक्नोलॉजी और इंडो-पैसिफिक रणनीति में काफी करीब आए हैं।दूसरी तरफ भारत का रूस के साथ भी दशकों पुराना रक्षा और ऊर्जा सहयोग है।ऐसे में भारत लगातार यह कहता रहा है कि वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर फैसले लेता है। भारत ने पहले भी साफ किया है कि वह किसी एक देश के दबाव में अपनी ऊर्जा नीति तय नहीं करेगा। Trump Administration
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी?
अगर अमेरिकी कानून सख्ती के साथ लागू होता है तो भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों और अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों के बीच संतुलन बनाना होगा।भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल होगा कि सस्ता रूसी तेल खरीदना जारी रखा जाए या संभावित अमेरिकी आर्थिक दबाव को देखते हुए रणनीति में बदलाव किया जाए।हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे बड़े रणनीतिक साझेदार के मामले में अमेरिका जल्दबाजी में कोई ऐसा फैसला नहीं लेना चाहेगा जिससे दोनों देशों के संबंधों पर बड़ा असर पड़े। Trump Administration
फिलहाल क्या स्थिति है?
अभी यह कानून अंतिम रूप से लागू नहीं हुआ है। अमेरिकी सीनेट में इसके संशोधित मसौदे का इंतजार किया जा रहा है। इसके बाद ही यह स्पष्ट होगा कि रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों के खिलाफ अमेरिका कितना सख्त कदम उठाता है और भारत जैसे देशों के लिए इसमें क्या राहत या छूट का प्रावधान रखा जाता है।फिलहाल पूरी दुनिया की नजर इस प्रस्तावित कानून पर टिकी हुई है, क्योंकि इसका असर सिर्फ रूस ही नहीं बल्कि वैश्विक तेल व्यापार, ऊर्जा बाजार और कई बड़े देशों की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। Trump Administration
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