भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक रिश्तों में एक बार फिर तनाव बढ़ता नजर आ रहा है। अमेरिकी व्हाइट हाउस की एक नई रिपोर्ट में भारत को ऐसे देशों के समूह का अहम हिस्सा बताया गया है, जिनके रास्ते कथित तौर पर चीनी सामान अमेरिकी बाजार तक पहुंचता रहा और इस दौरान उस पर लगाए गए भारी अमेरिकी टैरिफ से बचने की कोशिश की गई।
रिपोर्ट में इस पूरे तंत्र को “शैडो ट्रांसशिपमेंट नेटवर्क” यानी छिपे हुए माल-स्थानांतरण नेटवर्क का नाम दिया गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सलाहकार पीटर नवारो की रिपोर्ट “द ग्रेट ट्रांसशिपमेंट स्कैम” में दावा किया गया है कि चीन से आने वाले कुछ ऐसे उत्पाद, जिन पर अमेरिका ने भारी शुल्क लगाया था, उन्हें सीधे अमेरिका भेजने के बजाय तीसरे देशों के रास्ते अमेरिकी बाजार तक पहुंचाया गया।
करीब 60 अरब डॉलर के सामान का दावा
रिपोर्ट के मुताबिक, इस कथित अवैध ट्रांसशिपमेंट का अनुमानित मूल्य करीब 60 अरब डॉलर हो सकता है। अमेरिकी पक्ष का कहना है कि इस तरह की गतिविधियों से अमेरिकी सरकार को अरबों डॉलर के संभावित टैरिफ राजस्व का नुकसान हुआ। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि चीन से आने वाले सामान को पहले ऐसे देशों में भेजा गया, जहां अमेरिका की ओर से तुलनात्मक रूप से कम शुल्क लागू थे।
इसके बाद उन उत्पादों को अलग दस्तावेजों या बदले हुए मूल देश की पहचान के साथ अमेरिकी बाजार में भेजे जाने का दावा किया गया है। अमेरिकी रिपोर्ट का तर्क है कि यदि किसी देश से आने वाले उत्पाद पर भारी शुल्क है और उसे किसी दूसरे देश के रास्ते अमेरिका पहुंचाकर उस शुल्क से बचा जाता है, तो यह केवल व्यापार का रास्ता बदलना नहीं बल्कि अमेरिकी टैरिफ कानूनों को दरकिनार करने का मामला बन सकता है।
भारत का नाम क्यों आया?
रिपोर्ट में भारत का नाम ऐसे देशों में शामिल किया गया है जिनका इस्तेमाल कथित तौर पर चीन से आने वाले सामान के पुनर्निर्देशन के लिए किया गया। हालांकि, किसी देश का इस तरह के नेटवर्क में उल्लेख होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उसकी सरकार ने अवैध गतिविधियों को मंजूरी दी थी। रिपोर्ट में जिस व्यवस्था पर सवाल उठाए गए हैं, उसमें कई स्तरों पर कारोबार करने वाली कंपनियां, आयातक, निर्यातक और सप्लाई चेन से जुड़े कारोबारी शामिल हो सकते हैं। अमेरिका का आरोप मुख्य रूप से उन व्यापारिक रास्तों पर है जिनका इस्तेमाल टैरिफ से बचने के लिए किया गया हो।
ट्रंप प्रशासन का सख्त रुख
रिपोर्ट में केवल आरोप ही नहीं लगाए गए, बल्कि ऐसे देशों के खिलाफ कड़े कदम उठाने की मांग भी की गई है जो कथित तौर पर इस तरह के माल-स्थानांतरण को बढ़ावा देते हैं। इनमें संदिग्ध सामान को तुरंत रोकना, अतिरिक्त या दंडात्मक टैरिफ लगाना, प्रतिबंधों पर विचार करना और जरूरत पड़ने पर अमेरिकी बाजार तक पहुंच सीमित करना जैसे विकल्प शामिल हैं। इससे साफ है कि ट्रंप प्रशासन अब केवल चीन पर टैरिफ लगाने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि उन देशों और कंपनियों पर भी दबाव बढ़ाने की तैयारी में है जिनके जरिए चीनी सामान अमेरिकी शुल्क व्यवस्था से बचकर अमेरिका पहुंच सकता है।
भारत-अमेरिका रिश्तों के बीच बढ़ी चिंता
यह रिपोर्ट ऐसे समय सामने आई है जब भारत और अमेरिका के रिश्तों में व्यापार और रूस से जुड़े मुद्दों को लेकर तनाव बढ़ा हुआ है। दोनों देशों के बीच लंबे समय से रणनीतिक साझेदारी मजबूत रही है, लेकिन हाल के महीनों में व्यापारिक नीतियों और रूस से भारत के ऊर्जा संबंधों को लेकर अमेरिकी रुख अधिक सख्त हुआ है।
भारत लंबे समय से रूस से तेल खरीदता रहा है। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों की ओर से रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए रूसी तेल खरीदना जारी रखा। इसी मुद्दे ने भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों को एक नई चुनौती दी है।
रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ का प्रस्ताव
रिपोर्ट जारी होने के कुछ ही दिन पहले अमेरिकी सीनेट ने ऐसा विधेयक मंजूर किया, जिसमें रूस से तेल, गैस और अन्य उत्पाद खरीदने वाले कुछ देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का प्रावधान किया गया है। सीनेट में यह विधेयक 86-11 के वोट से पारित हुआ। इसके समर्थकों ने भारत को उन प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल किया है, जिन पर इस प्रस्ताव के तहत निशाना साधा जा सकता है।
यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत के अलावा कुछ अन्य देशों पर भी अमेरिकी दबाव बढ़ सकता है। वहीं, यूरोप के कुछ अमेरिकी सहयोगियों द्वारा रूस से समान तरह की ऊर्जा खरीद किए जाने के बावजूद उन्हें इस प्रस्ताव के दायरे से बाहर रखने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
चीन के बाद अब तीसरे देशों पर भी नजर
ट्रंप प्रशासन की व्यापार नीति में चीन पहले से ही सबसे बड़ा निशाना रहा है। अमेरिका ने चीनी उत्पादों पर भारी टैरिफ लगाए हैं, जिसके बाद कंपनियों ने अपनी सप्लाई चेन में बदलाव करना शुरू किया। ऐसे माहौल में अमेरिका की चिंता यह है कि चीन पर सीधे लगाए गए शुल्क का असर तब कम हो सकता है जब कंपनियां अपने सामान को दूसरे देशों के रास्ते अमेरिकी बाजार तक पहुंचाने लगें। यही वजह है कि अमेरिकी प्रशासन अब केवल यह नहीं देखना चाहता कि सामान कहां बना है, बल्कि यह भी देख रहा है कि वह अमेरिका तक किस रास्ते से पहुंच रहा है और उसकी सप्लाई चेन में कौन-कौन से देश शामिल हैं।
भारत के लिए क्या मायने?
भारत के लिए यह रिपोर्ट कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। एक तरफ भारत अमेरिका के साथ अपने व्यापार और निवेश संबंधों को लगातार मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ ऐसी रिपोर्ट दोनों देशों के बीच व्यापारिक बातचीत को मुश्किल बना सकती है। अगर अमेरिका भारत के जरिए आने वाले किसी विशेष उत्पाद या श्रेणी के सामान पर यह मानता है कि उसका वास्तविक स्रोत चीन है, तो उन उत्पादों पर अतिरिक्त जांच या शुल्क लगाया जा सकता है।
हालांकि, भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि अमेरिका के आरोपों का आधार क्या है और किन कंपनियों या उत्पादों को कथित ट्रांसशिपमेंट से जोड़ा गया है। केवल एक व्यापक रिपोर्ट के आधार पर पूरे भारतीय व्यापार क्षेत्र को संदिग्ध मानना उचित नहीं होगा।
कारोबारियों के लिए बढ़ सकती है मुश्किल
अगर अमेरिका ट्रांसशिपमेंट के खिलाफ जांच और कार्रवाई तेज करता है तो भारतीय निर्यातकों को अपने दस्तावेज, उत्पाद की उत्पत्ति और सप्लाई चेन से जुड़े रिकॉर्ड अधिक मजबूती से रखने पड़ सकते हैं। खासकर उन क्षेत्रों में जहां चीन से कच्चा माल या कंपोनेंट आता है और भारत में उसे प्रोसेस करके दूसरे बाजारों में भेजा जाता है, वहां अमेरिकी अधिकारियों की जांच बढ़ सकती है। ऐसे में कंपनियों को यह स्पष्ट करना पड़ सकता है कि किसी उत्पाद का वास्तविक निर्माण कहां हुआ, उसमें कितनी वैल्यू भारतीय स्तर पर जोड़ी गई और सप्लाई चेन में किस देश की भूमिका रही।
रिश्तों के लिए नया टेस्ट
भारत और अमेरिका के संबंध पिछले कुछ वर्षों में रक्षा, तकनीक, ऊर्जा और रणनीतिक सहयोग के स्तर पर काफी आगे बढ़े हैं। लेकिन व्यापारिक टैरिफ और रूस से भारत के संबंध अब इस साझेदारी के लिए नई चुनौती बन रहे हैं। अमेरिका की यह रिपोर्ट इसी व्यापक तनाव की एक और कड़ी के तौर पर देखी जा रही है। भारत के सामने अब दोहरी चुनौती है,एक तरफ अमेरिका के साथ आर्थिक और रणनीतिक रिश्तों को बनाए रखना और दूसरी तरफ अपनी स्वतंत्र व्यापार तथा ऊर्जा नीति को जारी रखना।
यह साफ नहीं है कि इस रिपोर्ट के आधार पर भारत से आने वाले किन उत्पादों या कंपनियों के खिलाफ अमेरिका तत्काल कार्रवाई करेगा। लेकिन इतना जरूर है कि ट्रंप प्रशासन ने चीन के सामान की कथित री-रूटिंग को लेकर अपनी निगरानी तेज कर दी है और भारत का नाम सामने आने से दोनों देशों के बीच व्यापारिक बातचीत पर इसका असर पड़ सकता है।


