UttarakhandNews : पहाड़ों की खूबसूरती बढ़ाने वाली बर्फ अब लोगों के लिए परेशानी का कारण बनती जा रही है। राज्य के कई ऊंचाई वाले इलाकों में स्नो-ब्लाइंडनेस के मामलों में बढ़ोतरी देखी जा रही है, जिससे स्थानीय निवासियों और पर्यटकों की आंखों पर असर पड़ रहा है। लगातार बढ़ते मामलों ने स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता भी बढ़ा दी है। बर्फ से ढके पहाड़ जहां देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं, वहीं इन्हीं क्षेत्रों में रहने वाले स्थानीय लोगों, आईटीबीपी के जवानों और आपदा प्रबंधन कर्मियों के लिए यह गंभीर स्वास्थ्य चुनौती बनते जा रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार बर्फ से परावर्तित होने वाली तेज पराबैंगनी किरणों के कारण लोगों में स्नो-ब्लाइंडनेस की समस्या बढ़ रही है, जिससे आंखों की रोशनी प्रभावित हो सकती है। उत्तरकाशी, चमोली, पौड़ी और टिहरी जैसे बर्फीले जिलों से बड़ी संख्या में ऐसे मरीज सामने आ रहे हैं, जो आंखों में दर्द, जलन और दृष्टि संबंधी परेशानियों से जूझ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बर्फीले क्षेत्रों में तेज धूप के दौरान पराबैंगनी (यूवी) किरणों का असर कई गुना बढ़ जाता है। लंबे समय तक इन किरणों के संपर्क में रहने से आंखों की रेटिना को नुकसान पहुंच सकता है, जिससे भीतर रक्तस्राव होने लगता है। चिकित्सा विज्ञान में इस स्थिति को ‘रेटिनल हेमरेज’ कहा जाता है। ऐसे मामले किसी एक मौसम तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे साल सामने आते रहते हैं। स्वास्थ्य संवाददाता अंकित यादव ने विभिन्न बर्फीले इलाकों का दौरा कर प्रभावित लोगों से बातचीत की, जहां स्नो-ब्लाइंडनेस से जूझ रहे कई लोगों ने आंखों की तकलीफ और इससे होने वाली परेशानियों को साझा किया।

“घर के बाहर बर्फ की चादर, आंखें बचाने को झुकानी पड़ती हैं नजरें”

उत्तरकाशी के गंगोत्री, हर्षिल और धराली जैसे ऊंचाई वाले क्षेत्रों में कई महीनों तक बर्फ जमी रहती है। सर्दियों के दौरान हालात ऐसे हो जाते हैं कि लोगों के घरों और आंगनों तक बर्फ की मोटी परत फैल जाती है। हर्षिल के निकट स्थित सुक्खी गांव के निवासी कमल सिंह राणा और सुगंधा देवी बताते हैं कि आसपास लगातार जमी रहने वाली बर्फ की तेज चमक उनकी आंखों पर बुरा असर डाल रही है। उन्हें अक्सर आंखों में जलन, लालिमा और धुंधला दिखाई देने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। स्थिति ऐसी हो गई है कि बाहर निकलते समय उन्हें नजरें झुकाकर चलना पड़ता है और वे जरूरत पड़ने पर ही घर से बाहर निकलते हैं।

सर्दियों में तो घर छोड़ना पड़ता है

हर्षिल के बगोरी गांव के निवासी भूपेंद्र बताते हैं कि उनके इलाके में सालभर बर्फ देखने को मिलती है, लेकिन सर्दियों के मौसम में यही बर्फ लोगों की मुश्किलें बढ़ा देती है। भारी बर्फबारी के कारण कई बार लोगों को अपने घर छोड़कर अन्य स्थानों पर जाना पड़ता है। उनका कहना है कि बर्फ से परावर्तित होने वाली तेज रोशनी ने उनकी आंखों को गंभीर नुकसान पहुंचाया है, जिसके चलते आज भी उन्हें साफ दिखाई नहीं देता। भूपेंद्र के अनुसार बचपन में बर्फ की वजह से उनकी आंखें प्रभावित हुई थीं और लंबे समय तक घरेलू उपचार के बाद उन्हें कुछ राहत मिली। वहीं, पौड़ी निवासी वीरेंद्र सिंह भी स्नो-ब्लाइंडनेस की समस्या से जूझ रहे हैं। आंखों की इस परेशानी के कारण उन्हें लंबे समय से चश्मे का सहारा लेना पड़ रहा है। चिकित्सकीय जांच में उनकी रेटिना में भी दिक्कत सामने आई है, जिसे डॉक्टर बर्फीले क्षेत्रों में लंबे समय तक रहने के प्रभाव से जोड़कर देख रहे हैं।

“चश्मा उतारते ही खतरे में पड़ती रेटिना, विशेषज्ञों ने जताई चिंता”

गंगोत्री में तैनात आईटीबीपी के जवान शिव कुमार का कहना है कि वे लंबे समय से बर्फीले और कठिन इलाकों में ड्यूटी निभा रहे हैं। इससे पहले वे लद्दाख में भी सेवाएं दे चुके हैं। उनका अनुभव बताता है कि लगातार बर्फ के संपर्क में रहने से आंखों में जलन और सूखापन जैसी समस्याएं आम हो गई हैं, जिसके चलते उन्हें हर सप्ताह आंखों की जांच करानी पड़ती है। उन्होंने बताया कि सबसे ज्यादा परेशानी तब होती है जब कई घंटे तक चश्मा पहनने के बाद पसीना आने की स्थिति में उसे कुछ समय के लिए उतारना पड़ता है। ऐसे में तेज बर्फीली चमक आंखों पर सीधा असर डालती है और नुकसान पहुंचा सकती है। शिव कुमार के अनुसार हर साल कई जवान स्नो-ब्लाइंडनेस की समस्या के कारण अस्पताल में भर्ती भी होते हैं।

“आईटीबीपी के 15 जवान स्नो-ब्लाइंडनेस की चपेट में”

श्रीनगर मेडिकल कॉलेज के वरिष्ठ नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. एएन पांडेय बताते हैं कि उनके पास पौड़ी, चमोली और रुद्रप्रयाग से स्नो-ब्लाइंडनेस के बड़ीसंख्या में मरीज पहुंचते हैं। इसमें आईटीबीपी व एनडीआरएफ के जवान, पर्यटक और स्थानीय लोग शामिल हैं। इसी वर्ष जनवरी महीने में जोशीमठ के पास स्थित आईटीबीपी के कैंप में तैनात जवानों में से 15 जवान एक साथ स्नो-ब्लाइंडनेस की चपेट में आ गए थे। इसके बाद उन्हें वहां से रेस्क्यू कर अस्पताल लाया गया था। एनडीआरएफ का एक जवान अभी अस्पताल में भर्ती है। आईटीबीपी के चिकित्सक डॉ. एन विग्नेशन का कहना है कि हाई एल्टीट्यूड पर ड्यूटी करने वाले जवानों को सीआर- 39 लेंस मुहैया कराए जाते हैं। साथ ही समय-समय पर आंखों की जांच भी की जाती है।

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