प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हाल ही में पूरी हुई पांच देशों की यात्रा को लेकर देश के सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स पर खूब चर्चा देखने को मिली। यूरोप दौरे के दौरान नीदरलैंड्स और नॉर्वे में भारतीय मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठे, जिससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रतिनिधिमंडल कुछ असहज नजर आया। इसके बाद देश में प्रेस फ्रीडम पर बहस तेज हुई, हालांकि कुछ ही दिनों में सोशल मीडिया का फोकस उस खास टॉफ़ी पर चला गया जो पीएम मोदी ने इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को भेंट की थी। विशेषज्ञों का मानना है कि इन विदेश यात्राओं के रणनीतिक उद्देश्य और उनके नतीजे सोशल मीडिया के बदलते ट्रेंड्स से कहीं ज्यादा गंभीर और दूरगामी हैं। मध्य पूर्व में जारी तनाव के बावजूद भारत ने यूएई के साथ रक्षा सहयोग को आगे बढ़ाया, जबकि नीदरलैंड्स—जहां प्रेस स्वतंत्रता और मानवाधिकार का मुद्दा उठा—ने भारत को अपना रणनीतिक साझेदार घोषित किया।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य में इन घटनाक्रमों को कैसे देखा जाए?

इसे समझने के लिए बीबीसी न्यूज़ हिन्दी के साप्ताहिक कार्यक्रम “द लेंस” में विदेशी मामलों के विशेषज्ञों से चर्चा हुई.

इस चर्चा में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़्म मुकेश शर्मा के साथ शामिल हुए पेरिस स्थित मीडिया इंडिया ग्रुप के मैनेजिंग एडिटर रणवीर सिंह नायर.

साथ ही, जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी की प्रोफे़सर डॉक्टर स्वास्ति राव ने अपने विचार रखे, जो ‘द प्रिंट’ में विदेश और रणनीतिक मामलों की सलाहकार संपादक के रूप में कार्यरत हैं.

यूरोप यात्रा और FTA: भारत के लिए कितना महत्वपूर्ण समीकरण?

पीएम मोदी ने नॉर्डिक-भारतीय शिखर सम्मेलन में हिस्सा लिया, जिसमें आइसलैंड, स्वीडन, नॉर्वे, डेनमार्क और फिनलैंड के प्रधानमंत्री शामिल हुए थे यूरोपीय संघ के साथ हालिया मुक्त व्यापार समझौते की पृष्ठभूमि में भारत की नीदरलैंड्स, स्वीडन, नॉर्वे और इटली यात्रा को बेहद अहम माना जा रहा है। इन दौरों को सिर्फ कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि व्यापार, रणनीतिक साझेदारी और वैश्विक सहयोग को मजबूत करने की दिशा में बड़े कदम के तौर पर देखा जा रहा है। सामरिक दृष्टि से ये यात्राएं यूरोप के साथ भारत के आर्थिक, रक्षा और भू-राजनीतिक संबंधों को नई मजबूती देने वाली मानी जा रही हैं।

पत्रकार रणवीर नायर कहते हैं, “भारत के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौते को लेकर कोई भी यूरोपीय संघ का सदस्य देश खुद से फ़ैसला नहीं ले सकता, यह सिर्फ़ यूरोपीय संघ को देखना है. ऐसे में इससे ख़ास फर्क नहीं पड़ता.”

हालांकि वे कहते हैं कि मध्य पूर्व में तनाव के बीच भारत के लिए ऊर्जा विविधीकरण ज़रूरी है, ऐसे में यूरोप में पीएम मोदी की यात्रा की टाइमिंग को वे कुछ हद तक अहम मानते हैं.

वे कहते हैं कि यूरोपीय देशों की यात्रा व्यापार नहीं बल्कि सामरिक स्तर पर अहम हैं क्योंकि ये भारत के लिए अलग-अलग तरह के मटीरियल के सप्लायर हैं. वे नीदरलैंड्स का उदाहरण देते हैं, “टाटा के साथ यहां की एएसएमएल कंपनी का समझौता हुआ है, वह भारत को एआई क्षेत्र में बढ़ने में मददगार होगा. अगर ठीक से यह लागू हुआ तो भारत विश्वस्तरीय चिप बना पाएगा.”

नॉर्डिक-भारतीय शिखर सम्मेलन के दौरान (बाएं से) आइसलैंड, स्वीडन, भारत, नॉर्वे, डेनमार्क व फिनलैंड के प्रधानमंत्री.

वे कहते हैं इटली और स्वीडन रक्षा से जुड़े सप्लायर हैं जो भारत को जहाज से लेकर तोप तक में मददगार हो सकते हैं. पत्रकार स्वास्ति राव पीएम मोदी की इटली यात्रा को रेखांकित करते हुए कहती हैं, “इटली के साथ हमारा व्यापार अच्छा है लेकिन कुछ विवादों से हमारा रक्षा सहयोगी नहीं बन सका. अब इस तरफ कुछ अहम कदम उठे हैं. इसकी एयरोस्पेस व नेवल उपकरण निर्माता कंपनियां अब भारत में सक्रिय हो रही हैं. हाल ही में हेलिकॉप्टर पर एमओयू और डिफेंस रोडमैप साइन हुआ है.”

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