लखनऊ: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही राज्य की सियासी तपिश बढ़ती जा रही है जिसे सावन की डंठी फुहारें भी कम नहीं कर पा रही हैं। ये चुनाव अब पंडित से लेकर पाकिस्तान तक पहुंच चुका है। दरअसल मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक कार्यक्रम के दौरान समाजवादी पार्टी को गिरगिट की तरह रंग बदलने वाली पार्टी बताते हुए अखिलेश यादव के पीडीए पर तंज कसा और सपा के पंडित से पाकिस्तान तक का नया फॉर्मूले भी लोगों को समझा दिया। उनके इस बयान से यूपी के पंडित यानी ब्राह्णण एक बार फिर राजनीति के केंद्र में आ गए हैं।
दरअसल मौका था पूर्व मुख्यमंत्री पद्म विभूषण कल्याण सिंह (बाबूजी) की पांचवीं पुण्यतिथि का जिसके लिए इकाना स्टेडियम में ‘हिंदू गौरव दिवस’ कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इसमें बोलते हुए योगी आदित्यनाथ ने समाजवादी पार्टी और इसके मुखिया अखिलेश यादव को आड़े हाथों लेते हुए कहा, ‘गिरगिट की तरह रंग बदलने वाली पार्टी के लोग पीडीए को कैसे परिभाषित करते हैं, पी पिछड़ा था, फिर पंडित हो गया, देखना, एक दिन ये लोग पी से पाकिस्तान कर देंगे।’ उन्होंने कहा, ‘इनके बयानों पर भरोसा नहीं किया जा सकता । ये कब क्या बोलेंगे, कोई भरोसा नहीं । ये ऐसे गिरगिट हैं कि जिस पेड़ पर चढ़ेंगे, उसकी ही सुखा डालेंगे’।
सीएम योगी के पंडित से पाकिस्तान वाले इस बयान के अब कई राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं. बीते दिनों मायावती से लेकर अखिलेश तक यूपी के ब्राह्मण वोटरों को अपने पाले में लाने की कोशिश करते हुए दिख चुके हैं ।
यूपी में ब्राह्णण वोटों का समीकरण क्या है ?
दरअसल उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण वोटरों की संख्या का कोई आधिकारिक जातिगत आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन तमाम आकलनों के मुताबिक राज्य में ब्राह्मण वोटर लगभग 9 से 10 फीसदी के आसपास है। कुछ राजनीतिक विश्लेषक इसे 10 से 12 फीसदी भी बताते हैं. यूपी की राजनीति में ब्राह्मणों का प्रभाव उनकी संख्या से ज्यादा राजनीतिक भागीदारी, संगठन क्षमता और कई विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका के कारण माना जाता है। खासकर पूर्वांचल, अवध और शहरी क्षेत्रों में इनका प्रभाव अधिक देखा जाता है जिस पर बहुजन समाज पार्टी के अलावा इस बार अखिलेश यादव भी नजरें गड़ाए बैठे हैं।
अगर राजनीतिक समीकरण के हिसाब से देखें तो ब्राह्मण + ठाकुर + अन्य सवर्ण वोट बीजेपी के पारंपरिक समर्थक और कोर वैट बैंक का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं. लेकिन अब सपा, बसपा और कांग्रेस जैसे विपक्षी दल भी ब्राह्मण वोटों को साधने के लिए अलग रणनीतियां बना रहे हैं।
ब्राह्मण वोटरों को अपने पाले में लाने की कोशिश में अखिलेश
अखिलेश यादव ने हाल के दिनों में सपा की राजनीति को PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) से आगे बढ़ाते हुए ब्राह्मणों को जोड़ने का संकेत दिया था. सपा नेताओं की ओर से PDA में “P” को पंडित से जोड़ने की चर्चा भी सामने आई थी। अखिलेश सपा के पुराने MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण से आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। अखिलेश यादव यह संदेश देना चाहते हैं कि सपा अब सिर्फ यादव और मुस्लिम वोटों तक सीमित नहीं है, बल्कि ब्राह्मणों समेत अन्य वर्गों को भी साथ लेना चाहती है ।
वहीं अखिलेश के ब्राह्मणों वोटरों को अपने पाले में लाने की कवायद को लेकर मायावती ने अखिलेश पर “मौके के हिसाब से जातीय राजनीति करने” का आरोप लगाया था । उन्होंने कहा था कि सपा अब वोट के लिए ब्राह्मण समाज को याद कर रही है । इसके साथ ही मायावती ने बसपा की 2007 वाली सोशल इंजीनियरिंग की वापसी का संकेते देते हुए यह बताने की कोशिश की थी कि ब्राह्मणों को सम्मान और राजनीतिक भागीदारी देने का रिकॉर्ड बसपा के पास रहा है और सपा का नया ब्राह्मण प्रेम चुनावी रणनीति मात्र है ।
-कुणाल कौशल


