लखनऊ: उत्तर प्रदेश की सियासत में समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव और राष्ट्रीय लोकदल प्रमुख जयंत चौधरी के बीच शुरू हुई जुबानी जंग अब लगातार तेज होती जा रही है। ‘चवन्नी से रुपया’ वाले तंज से शुरू हुआ विवाद अब गन्ना किसानों, महंगाई, गाड़ियों के माइलेज और ऊर्जा स्वाधीनता जैसे मुद्दों तक पहुंच गया है। जयंत चौधरी ने सोशल मीडिया के जरिए अखिलेश यादव पर निशाना साधते हुए उनकी राजनीतिक प्राथमिकताओं पर सवाल उठाए हैं। जयंत चौधरी ने लिखा, “राष्ट्रीय लोकदल की सीटों की फिक्र है,अपनी नहीं।

गुलाब जामुन, रसगुल्ले की कीमत की चिंता है… गन्ना किसानों की नहीं! गाड़ी के माइलेज पर दुखी हैं, भारत की ऊर्जा स्वाधीनता की परवाह नहीं।” जयंत के इस बयान को सीधे तौर पर अखिलेश यादव के हालिया बयानों का जवाब माना जा रहा है। खास बात यह है कि अब दोनों नेताओं के बीच विवाद महज पुराने गठबंधन या व्यक्तिगत राजनीतिक रिश्तों तक सीमित नहीं रह गया है। दोनों नेता एक-दूसरे की राजनीतिक प्राथमिकताओं और मुद्दों को लेकर जनता के बीच अपनी-अपनी बात रखने की कोशिश कर रहे हैं।

‘चवन्नी से रुपया’ वाले बयान से शुरू हुआ विवाद

इस राजनीतिक तकरार की शुरुआत अखिलेश यादव के उस बयान से हुई थी, जिसमें उन्होंने जयंत चौधरी का नाम लिए बिना ‘चवन्नी को रुपया बनाने’ जैसा तंज कसा था। जयंत चौधरी और रालोद ने इस टिप्पणी को अपने ऊपर लिया और इसके बाद जयंत ने अखिलेश पर पलटवार किया। जयंत ने कहा था कि अगर राजनीतिक लड़ाई में कुछ सस्ते शब्द ही इस्तेमाल करने थे तो उनका नाम लेकर बात की जाती।

उन्होंने जाट समाज को लेकर की गई टिप्पणियों पर भी सवाल उठाए और राजनीतिक अहंकार को लेकर अखिलेश पर निशाना साधा। इसके बाद विवाद ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति का रंग भी ले लिया। स्थानीय स्तर पर सपा और रालोद नेताओं के बीच भी बयानबाजी देखने को मिली, जिससे दोनों दलों के बीच बढ़ती दूरी और साफ दिखाई देने लगी।

गन्ना किसानों का मुद्दा क्यों अहम?

जयंत चौधरी के ताजा बयान में गन्ना किसानों का जिक्र सबसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में गन्ना और किसान लंबे समय से बड़ा चुनावी मुद्दा रहे हैं। रालोद की राजनीति भी चौधरी चरण सिंह की किसान राजनीति और पश्चिमी यूपी के सामाजिक आधार से गहराई से जुड़ी रही है। ऐसे में जब जयंत ने मिठाइयों की कीमत और गाड़ियों के माइलेज की चर्चा के साथ गन्ना किसानों का मुद्दा उठाया, तो इसके राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं। संदेश साफ है कि रालोद खुद को किसान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से जुड़े मुद्दों की राजनीति करने वाली पार्टी के तौर पर पेश करना चाहती है।

कभी साथ थे अखिलेश और जयंत

एक समय अखिलेश यादव और जयंत चौधरी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा के खिलाफ विपक्षी गठजोड़ का अहम चेहरा थे। 2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल ने मिलकर चुनाव लड़ा था। उस समय दोनों नेताओं की जोड़ी को पश्चिमी यूपी में मजबूत सामाजिक समीकरण के तौर पर देखा गया था।हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले दोनों दलों के रास्ते अलग हो गए। जयंत चौधरी एनडीए के साथ चले गए और इसके बाद सपा और रालोद के बीच राजनीतिक दूरी बढ़ती चली गई।

अब स्थिति यह है कि जो दोनों नेता कभी एक मंच पर भाजपा के खिलाफ रणनीति बनाते नजर आते थे, वही अब एक-दूसरे की राजनीति पर सवाल उठा रहे हैं।

2027 से पहले पश्चिमी यूपी में बढ़ेगी टक्कर?

इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा असर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति पर पड़ सकता है। रालोद का पारंपरिक आधार जाट और किसान राजनीति से जुड़ा रहा है, जबकि सपा पश्चिमी यूपी में मुस्लिम, यादव, पिछड़े और अन्य सामाजिक समूहों के बीच अपना प्रभाव मजबूत करने की कोशिश करती रही है। जयंत चौधरी के सामने चुनौती यह है कि वह अपने पारंपरिक किसान-जाट आधार को मजबूत बनाए रखें और यह संदेश दें कि रालोद केवल चुनावी गठबंधनों के लिए नहीं, बल्कि क्षेत्रीय और किसान मुद्दों की मजबूत आवाज है।

दूसरी ओर अखिलेश यादव के लिए पश्चिमी यूपी में रालोद का बढ़ता प्रभाव एक अलग राजनीतिक चुनौती है। सपा लगातार अपने PDA सामाजिक समीकरण को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में सपा और रालोद की राजनीतिक राहें कई सीटों पर एक-दूसरे के सामने खड़ी हो सकती हैं।

अब मुद्दों के जरिए एक-दूसरे पर हमला

अखिलेश और जयंत के बीच चल रही बयानबाजी को देखें तो विवाद अब केवल ‘चवन्नी’ और ‘रुपये’ तक नहीं है। जयंत के ताजा बयान में गन्ना किसान, मिठाइयों की कीमत, गाड़ी का माइलेज और भारत की ऊर्जा स्वाधीनता जैसे मुद्दे शामिल हैं। यानी दोनों नेता अब अपने-अपने राजनीतिक नैरेटिव को जनता के सामने रखने की कोशिश कर रहे हैं।

जयंत जहां किसान और पश्चिमी यूपी के मुद्दों पर फोकस कर रहे हैं, वहीं अखिलेश की राजनीति PDA और भाजपा के खिलाफ व्यापक विपक्षी संदेश पर केंद्रित है। हालांकि अखिलेश यादव ने अपने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ‘चवन्नी’ वाले बयान को लेकर सफाई भी दी। उन्होंने कहा कि वीडियो देखा जा सकता है और उसमें कोई आपत्तिजनक बात या बयान नहीं है।

2027 में होगा असली इम्तिहान

फिलहाल दोनों नेताओं के बीच सोशल मीडिया पर चल रही यह ‘ट्वीट पॉलिटिक्स’ आने वाले दिनों में और तेज होने के संकेत दे रही है। 2027 का विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आएगा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सपा और रालोद के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और बढ़ सकती है। अखिलेश यादव के लिए यह लड़ाई जहां PDA और भाजपा-रालोद गठबंधन के खिलाफ राजनीतिक संदेश मजबूत करने की है, वहीं जयंत चौधरी के लिए किसान, जाट और पश्चिमी यूपी की अपनी राजनीतिक विरासत को मजबूत बनाए रखने की चुनौती है।

फिलहाल ‘चवन्नी से रुपया’ का विवाद अब मुद्दों की सियासत में बदल चुका है। गन्ना किसान, महंगाई और ऊर्जा जैसे मुद्दों के जरिए दोनों खेमे अपनी-अपनी जमीन मजबूत करने में जुटे हैं। इसका अंतिम असर कितना होगा, इसका फैसला 2027 के चुनावी मैदान में ही होगा।

रिपोर्ट- फरमान अब्बास मन्जुल/ मानवी

Share.
Leave A Reply

© 2026 Nation27

Exit mobile version