क्या कभी आपने सोचा है कि कोई इंसान सिर्फ अपने जेंडर (लिंग) को सही करवाने के लिए 8 साल तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट सकता है। उत्तर प्रदेश के शामली जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है जिसे सुनकर आप भी हैरान रह जाएंगे। एक छात्रा पिछले 8 सालों से अपने आधार कार्ड में एक मामूली सी गलती को ठीक करवाने के लिए संघर्ष कर रही है और अब उसे अपनी पहचान साबित करने के लिए मेडिकल टेस्ट का सहारा लेना पड़ रहा है।
मामला जनपद शामली के थाना कोतवाली क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले गांव बलवा का है। यहाँ की रहने वाली फातमा पुत्री तय्यब ने 10 जनवरी 2015 को अपनी जन्मतिथि ठीक कराने के लिए आधार में आवेदन किया था। जन्मतिथि तो सही होकर आ गई, लेकिन आधार सेंटर की एक बड़ी लापरवाही के कारण ‘स्त्री’ (फीमेल) के कॉलम में ‘पुरुष’ (मेल) दर्ज हो गया। यहीं से फातमा की परेशानियों का अंतहीन सिलसिला शुरू हुआ।
जब फातमा ने 31 जुलाई 2018 को जेंडर सुधरवाने के लिए आवेदन किया, तो यूआईडीएआई (UIDAI) के नियमों का हवाला देकर यह कहकर मना कर दिया गया कि ‘सुधार की लिमिट समाप्त हो चुकी है।’ इसके बाद फातमा ने साल 2022 में बैंक ऑफ बड़ौदा स्थित आधार सेंटर और मार्च 2026 में एक जन सेवा केंद्र का दरवाजा खटखटाया। आरोप है कि जन सेवा केंद्र संचालक ने काम करवाने के नाम पर 4,000 रुपये भी ठग लिए। राहत न मिलने पर फातमा जून 2026 में सहारनपुर और फिर दिल्ली के अक्षरधाम स्थित मुख्य आधार मुख्यालय तक पहुँची, लेकिन हर जगह से उसे निराशा ही हाथ लगी।”
यह सिर्फ एक तकनीकी गलती नहीं, बल्कि फातमा के भविष्य पर लगा एक बड़ा ग्रहण बन चुकी है। फातमा इंटरमीडिएट की छात्रा है। आधार में जेंडर गलत होने की वजह से उसका बैंक खाता नहीं खुल सका, जिससे उसे आईटीआई की छात्रवृत्ति (स्कॉलरशिप) से वंचित होना पड़ा। उसने मार्केटिंग में डिप्लोमा भी किया है, लेकिन दस्तावेजों में विसंगति के कारण उसे रोजगार के अवसर नहीं मिल पा रहे हैं।
हैरानी की बात यह है कि फातमा के पास उसका मतदाता पहचान पत्र, हाईस्कूल की मार्कशीट और पुराना आधार कार्ड मौजूद है जिन पर उसका सही जेंडर दर्ज है लेकिन इसके बावजूद आधार डेटाबेस में सुधार नहीं हो रहा। अब जिला आधार मुख्यालय ने उसे सीएमओ द्वारा प्रमाणित मेडिकल परीक्षण प्रमाण पत्र लाने को कहा है। गुरुवार को जब फात्मा सीएमओ के पास पहुँची, तो उन्हें सीएचसी शामली की स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ के पास भेजा गया, जहाँ डॉक्टर ने उन्हें शनिवार को माता-पिता के साथ मेडिकल परीक्षण के लिए बुलाया है।
फात्मा और उसके परिवार ने प्रशासन और यूआईडीएआई से गुहार लगाई है कि उनकी समस्या का जल्द से जल्द समाधान किया जाए, ताकि एक तकनीकी त्रुटि किसी बेटी के सपनों और अधिकारों का गला न घोटे। सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी प्रणालियों की भूल सुधारने के लिए नागरिकों को सालों-साल तक इस तरह प्रताड़ित होना पड़ेगा।
एक उस हमारे पास आई थी जिसे एक प्रार्थना पत्र सीएम साहब को दिया था जिसमें उसने कहा कि उसके आधार कार्ड में उसके जेंडर में फीमेल की जगह मिल अंकित हो गया है तो वह अपने लिंग परीक्षण का स्वास्थ्य विभाग से प्रमाण पत्र चाहती थी तो सीएमओ साहब ने हमारे यहां एक ही लेडी डॉक्टर जो ऊन में सीएचसी में तैनात है डॉ शिवानी उनके लिए रेफर कर दिया था। तो डॉक्टर शिवानी ने इसमें अनभिज्ञता जताई थी कि मैं सिर्फ एक प्लेन एमबीपीएस हूं और इसकी जांच किसी गाइनेकोलॉजिस्ट से कराई जाए या मेरठ मेडिकल कॉलेज या किसी भी हायर सेंटर से करना उचित होगा।
आज यह हमारे पास दोबारा से आयी थी तो हमने फिर उसको अपने यहां डॉक्टर विजेंद्र है जो सीएचसी शामली पर तैनात है उनके पास रेफर किया है कि वह एक बार फीमेल नसों की उपस्थिति में उनकी जांच वगैरह जो भी संबंधित जांच कर करके उसकी रिपोर्ट प्रेषित करने के लिए उनको बोला है। पिछले 7-8 सालों से पीड़ित है वह लड़की उसने यही बताया कि मैं काफी दिनों से परेशान हूं बड़ी परेशान दिख रही थी तो हमने और सीएमओ साहब ने उसकी हेल्प की है और उसको रेफर किया गया है।
रिपोर्ट- पंकज मलिक/सोनू सिंह


