आगामी कुंभ मेले की तैयारियों के बीच धर्मनगरी हरिद्वार में संतों के अखाड़ों के भीतर छिड़ी राजनीति ने नया मोड़ ले लिया है। कुंभ के आयोजन से पहले ही अखाड़ों के बीच आपसी खींचतान और गुटीय संघर्ष चरम पर पहुंच गया है। अखाड़ा परिषद के पहले से दो फाड़ होने के बाद, अब ‘नया उदासीन अखाड़ा’ भी आंतरिक कलह और दो धड़ों में बंटने से चर्चाओं के केंद्र में है।
अखाड़ों में खुला ‘महायुद्ध’
हरिद्वार कुंभ के लिए राज्य सरकार जहां बुनियादी ढांचों और सुरक्षा व्यवस्था को अंतिम रूप देने में जुटी है, वहीं दूसरी ओर संतों के विभिन्न धड़े एक-दूसरे के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोले हुए हैं। नया उदासीन अखाड़े के संतों का एक गुट, जो पंजाब से हरिद्वार पहुँचा है, उसने निरंजनी अखाड़े समर्थित अखाड़ा परिषद को अपना समर्थन देने का ऐलान किया है। इसके विपरीत, अखाड़े के दूसरे पक्ष ने इस फैसले का कड़ा विरोध करते हुए प्रतिद्वंद्वी गुट के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
वर्चस्व की लड़ाई और आरोपों का दौर
अखाड़ों के बीच मचे इस घमासान के चलते स्थिति काफी तनावपूर्ण बनी हुई है। अखाड़ा परिषद (निरंजनी गुट) के अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी ने इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय से उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। अखाड़े के वरिष्ठ संत महंत गणेश दास और मुखिया महंत भगत राम ने भी इस विवाद पर अपने पक्ष रखे हैं, जिससे अखाड़ों के बीच वैचारिक और संगठनात्मक मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं।
इतिहास का दोहराता चक्र
विशेषज्ञों का मानना है कि अखाड़ों में पदों और वर्चस्व को लेकर कीचड़ उछालने की यह परंपरा कोई नई नहीं है। हरिद्वार कुंभ का इतिहास गवाह रहा है कि आयोजन की भव्यता के बीच अक्सर अखाड़ों की आपसी रस्साकशी प्रशासन के लिए चुनौती बनी रहती है। सत्ता और पद के लालच में संतों के बीच होने वाला यह संघर्ष न केवल धर्मनगरी की गरिमा पर सवालिया निशान लगाता है, बल्कि कुंभ के सफल आयोजन की राह में भी बाधा पैदा करता है।
कुंभ जैसे बड़े धार्मिक आयोजन में संतों का सामंजस्य और अनुशासन अत्यंत आवश्यक है। ऐसे में अखाड़ों की इस आपसी कलह को सुलझाना प्रशासन और अखाड़ा परिषद के वरिष्ठ संतों के लिए एक बड़ी परीक्षा बन गया है। यदि समय रहते इस विवाद पर विराम नहीं लगाया गया, तो कुंभ के दौरान व्यवस्था बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

