शिमला: हिमाचल प्रदेश में इस साल मानसून और प्राकृतिक आपदाओं ने भारी नुकसान पहुंचाया है। पहाड़ी राज्य के कई जिलों में तेज बारिश, भूस्खलन, बादल फटने और बाढ़ जैसी घटनाओं ने जनजीवन को प्रभावित किया है। प्रदेश में अब तक 111 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि नौ लोग घायल हुए हैं। आपदा के कारण सैकड़ों मकान क्षतिग्रस्त हुए हैं और हजारों किलोमीटर सड़कें प्रभावित हुई हैं।
विधानसभा में विधायक विपिन सिंह परमार के सवाल के जवाब में राजस्व मंत्री की ओर से पेश किए गए आंकड़ों में प्राकृतिक आपदा से हुए नुकसान की तस्वीर सामने आई है। आंकड़ों के मुताबिक, सिरमौर जिला सबसे ज्यादा प्रभावित रहा है। यहां 87 लोगों की मौत हुई है। इसके अलावा लाहौल-स्पीति में 16, सोलन में चार, मंडी में दो और कांगड़ा तथा कुल्लू में एक-एक व्यक्ति की जान गई है।
सिरमौर में सबसे ज्यादा मौतें
आपदा से हुई जनहानि के आंकड़ों में सिरमौर सबसे ऊपर है। जिले में अब तक 87 लोगों की मौत दर्ज की गई है। लगातार बारिश और इससे जुड़ी घटनाओं ने कई इलाकों में मुश्किलें बढ़ाईं। इसके बाद लाहौल-स्पीति में 16 लोगों की मौत हुई। सोलन में चार, मंडी में दो और कांगड़ा तथा कुल्लू में एक-एक मौत दर्ज की गई है। प्रदेश में नौ लोग घायल भी हुए हैं। वहीं कांगड़ा में पांच परिवारों के विस्थापित होने की जानकारी सामने आई है, जिन्हें सुरक्षित स्थानों पर जाना पड़ा।
743 मकानों को पहुंचा नुकसान
प्राकृतिक आपदा का असर लोगों के घरों पर भी पड़ा है। प्रदेश में कुल 743 मकान क्षतिग्रस्त हुए हैं। इनमें सोलन में सबसे अधिक 239 मकानों को नुकसान पहुंचा है। कांगड़ा में 155 और मंडी में 136 मकान प्रभावित हुए हैं। कई जगहों पर घरों को आंशिक नुकसान पहुंचा, जबकि कुछ स्थानों पर मकान रहने लायक नहीं रहे। बारिश और भूस्खलन के कारण प्रभावित परिवारों के सामने रहने और रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने की चुनौती खड़ी हुई है।
3674 सड़कें हुईं क्षतिग्रस्त
हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य में सड़कों का संपर्क व्यवस्था में अहम योगदान है। ऐसे में सड़कों को हुआ नुकसान सीधे तौर पर आम लोगों की आवाजाही और आवश्यक सेवाओं को प्रभावित करता है। प्रदेश में अब तक 3674 सड़कें क्षतिग्रस्त होने की जानकारी सामने आई है।
कांगड़ा में 736 सड़कें प्रभावित हुईं, जबकि मंडी में 615 और शिमला में 614 सड़कों को नुकसान पहुंचा। चंबा में भी बड़ी संख्या में सड़कें प्रभावित हुई हैं। बारिश के दौरान कई जगह भूस्खलन और मलबा आने से सड़कें बंद हुईं। इससे कई इलाकों में यातायात बाधित रहा और लोगों को लंबा रास्ता तय करना पड़ा।
11 पुलों को भी नुकसान
सड़कों के साथ प्रदेश के 11 पुल भी प्राकृतिक आपदा की चपेट में आए हैं। पुलों को नुकसान होने से कई क्षेत्रों में संपर्क प्रभावित हुआ। पहाड़ी इलाकों में पुलों का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि कई गांव और बस्तियां इन्हीं संपर्क मार्गों के जरिए मुख्य सड़क नेटवर्क से जुड़ी होती हैं। प्रशासन और संबंधित विभागों की ओर से क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे को बहाल करने के लिए काम किया जा रहा है, लेकिन लगातार खराब मौसम के बीच कई जगहों पर मरम्मत कार्य भी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
3090 पेयजल योजनाएं प्रभावित
प्राकृतिक आपदा का असर सिर्फ सड़कों और मकानों तक सीमित नहीं रहा। प्रदेश की पेयजल व्यवस्था को भी बड़ा नुकसान हुआ है। कुल 3090 पेयजल योजनाएं प्रभावित हुई हैं। चंबा में 548, शिमला में 514 और कांगड़ा में 499 पेयजल योजनाओं को नुकसान पहुंचा है। कई जगह पाइपलाइन और दूसरी जलापूर्ति सुविधाएं प्रभावित होने से लोगों को पानी की समस्या का सामना करना पड़ा।
बिजली व्यवस्था भी प्रभावित
बारिश और आपदा से प्रदेश की बिजली व्यवस्था को भी नुकसान हुआ है। आंकड़ों के अनुसार 494.49 किलोमीटर उच्चदाब बिजली लाइन और 755.07 किलोमीटर निम्नदाब लाइन क्षतिग्रस्त हुई हैं। इसके अलावा 1770 बिजली के खंभे और 338 ट्रांसफार्मर भी नुकसान की चपेट में आए हैं। बिजली के बुनियादी ढांचे को नुकसान होने के कारण कई इलाकों में आपूर्ति प्रभावित हुई। खराब मौसम के बीच बिजली व्यवस्था को सामान्य करना भी विभाग के लिए बड़ी चुनौती बना रहा।
सरकारी विभागों को करोड़ों का नुकसान
प्राकृतिक आपदा से सरकारी विभागों और निजी संपत्तियों को भी बड़ा आर्थिक नुकसान हुआ है। लोक निर्माण विभाग की सड़कों को करीब 536.83 करोड़ रुपये का प्रत्यक्ष नुकसान होने का अनुमान है। वहीं जल शक्ति विभाग की पेयजल परियोजनाओं को 116.14 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। निजी संपत्तियों को हुए प्रत्यक्ष नुकसान का आंकड़ा 12.87 करोड़ रुपये बताया गया है। इन आंकड़ों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि मानसून के दौरान हिमाचल में सिर्फ जनजीवन ही नहीं, बल्कि राज्य के बुनियादी ढांचे को भी भारी झटका लगा है।
जुलाई में कई जिलों में हुई भारी बारिश
एक मार्च से एक अगस्त तक प्रदेश में औसत वर्षा 109.80 मिलीमीटर दर्ज की गई। जुलाई के दौरान कई जिलों में बारिश का असर ज्यादा रहा। कांगड़ा में जुलाई महीने में 546.2 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई। सिरमौर में 487.5 मिलीमीटर और चंबा में 447.5 मिलीमीटर बारिश हुई। भारी बारिश के कारण कई स्थानों पर नदियों और नालों का जलस्तर बढ़ा और भूस्खलन की घटनाएं सामने आईं। बारिश का असर खास तौर पर पहाड़ी इलाकों की सड़कों, पेयजल योजनाओं और बिजली ढांचे पर पड़ा। कई स्थानों पर मलबा आने से संपर्क मार्ग बाधित हुए।
कुल्लू और लाहौल-स्पीति में तीन जगह फटा बादल
कुल्लू और लाहौल-स्पीति में तीन स्थानों पर बादल फटने की घटनाएं भी सामने आईं। बादल फटने की घटनाएं पहाड़ी क्षेत्रों में अचानक बड़े पैमाने पर पानी और मलबा आने का कारण बनती हैं। हालांकि इन घटनाओं में किसी व्यक्ति की मौत नहीं हुई, लेकिन स्थानीय स्तर पर बुनियादी ढांचे और जनजीवन पर इसका असर पड़ा। प्रशासन की ओर से ऐसे संवेदनशील क्षेत्रों में मौसम और आपदा की स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है।
पहाड़ी राज्य के लिए चुनौती बना मानसून
हिमाचल प्रदेश में हर साल मानसून के दौरान भूस्खलन, बादल फटने और अचानक बाढ़ जैसी घटनाएं सामने आती हैं, लेकिन इस बार सामने आए नुकसान के आंकड़े स्थिति की गंभीरता को दिखाते हैं। एक तरफ लोगों की जान गई, वहीं दूसरी ओर मकानों, सड़कों, पुलों, पेयजल योजनाओं और बिजली व्यवस्था को भी भारी नुकसान पहुंचा है।
सबसे बड़ी चुनौती प्रभावित क्षेत्रों में सामान्य स्थिति बहाल करना है। सड़कें और पुल क्षतिग्रस्त होने से राहत सामग्री पहुंचाना मुश्किल हो सकता है, जबकि पेयजल और बिजली व्यवस्था के प्रभावित होने से लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर सीधा असर पड़ता है।
राहत और पुनर्बहाली पर फोकस
अब प्रशासन के सामने प्रभावित इलाकों में राहत पहुंचाने के साथ-साथ क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे को जल्द से जल्द बहाल करने की चुनौती है। सड़क, बिजली और पेयजल जैसी आवश्यक सेवाओं की बहाली को प्राथमिकता दी जा रही है। प्राकृतिक आपदा में 111 लोगों की मौत का आंकड़ा सबसे ज्यादा चिंता पैदा करने वाला है। वहीं 743 मकानों के क्षतिग्रस्त होने और हजारों सड़कों व पेयजल योजनाओं के प्रभावित होने से साफ है कि इस मानसून ने हिमाचल के कई हिस्सों में सामान्य जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है।
फिलहाल प्रशासन की नजर मौसम की स्थिति और संवेदनशील इलाकों पर बनी हुई है। आने वाले दिनों में बारिश के दौरान किसी भी संभावित खतरे को कम करने के लिए स्थानीय स्तर पर निगरानी और राहत व्यवस्था को मजबूत रखना सबसे अहम चुनौती होगी।

