भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने आज तड़के अंतरिक्ष के क्षेत्र में एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की। आंध्र प्रदेश स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से भोर करीब पौने तीन बजे जीएसएलवी-एफ17 रॉकेट ने देश के सबसे महत्वपूर्ण सैटेलाइटों में से एक, ईओएस-05, को लेकर उड़ान भरी। कुछ ही मिनटों के भीतर मिशन को पूर्ण सफलता मिली और सैटेलाइट को निर्धारित कक्षा में स्थापित कर दिया गया।
अधिकारियों के अनुसार, ईओएस-05 देश का पहला ऐसा इमेजिंग सैटेलाइट है जिसे जियोसिंक्रोनस कक्षा से पृथ्वी की तस्वीरें लेने के लिए डिजाइन किया गया है। अब तक इस्तेमाल होने वाले अधिकांश सैटेलाइट निचली कक्षा (लो अर्थ ऑर्बिट) से गुजरते हुए किसी क्षेत्र की सीमित झलक ही उपलब्ध करा पाते थे, क्योंकि वे लगातार एक ही स्थान पर सक्रिय नहीं रह सकते। इसके विपरीत, जियोसिंक्रोनस कक्षा में तैनात होने के कारण ईओएस-05 किसी एक क्षेत्र पर निरंतर निगरानी बनाए रखने में सक्षम होगा। यह सैटेलाइट पृथ्वी से लगभग 36 हजार किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थापित किया गया है।
गौरतलब है कि जीएसएलवी रॉकेट को अनौपचारिक रूप से ‘नॉटी बॉय’ के नाम से जाना जाता रहा है, जो इसकी पिछली असफलताओं की देन है। वर्ष 2021 में जीएसएलवी-एफ10 मिशन के दौरान क्रायोजेनिक चरण में तकनीकी खराबी आने से जीआईसैट-1 सैटेलाइट अपनी निर्धारित कक्षा तक नहीं पहुंच पाया था। इसी पृष्ठभूमि के चलते इस बार के प्रक्षेपण पर विशेषज्ञों और आम जनता दोनों की गहरी नजर थी। मिशन की सफलता के साथ ही इस रॉकेट ने अपनी पुरानी छवि से उबरते हुए एक बार फिर भारत की अंतरिक्ष क्षमताओं को साबित किया।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह सैटेलाइट केवल एक तकनीकी उपलब्धि तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके व्यावहारिक उपयोग भी दूरगामी होंगे। इससे देश की सीमाओं पर सतत निगरानी संभव होगी, साथ ही आपदा प्रबंधन, कृषि नियोजन और सुरक्षा तंत्र को भी सशक्त बनाने में मदद मिलेगी। सीमा पार की गतिविधियों पर नजर रखने की दृष्टि से इस मिशन को रक्षा प्रतिष्ठानों के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इसरो के इस प्रक्षेपण को आत्मनिर्भर भारत अभियान की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है। जिस रॉकेट पर कभी इसकी विश्वसनीयता को लेकर सवाल उठाए जाते थे, वह आज देश की तकनीकी प्रगति और वैज्ञानिक क्षमता का प्रतीक बन चुका है।

