लखनऊ: स्कूल में हिजाब पहनने की अनुमति से जुड़ी याचिका खारिज किए जाने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर मुस्लिम धर्मगुरुओं की प्रतिक्रिया सामने आई है। मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना साजिद रशीदी और शिया धर्मगुरु मौलाना यासूब अब्बास ने हाईकोर्ट के फैसले पर सवाल उठाते हुए इसे धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्ति की पसंद से जुड़ा मुद्दा बताया है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्कूल के ड्रेस कोड का पालन करने पर जोर दिया है। अदालत ने हेडस्कार्फ को इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा मानने से इनकार किया है। ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी ने हाईकोर्ट के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे धार्मिक आजादी और निजी स्वतंत्रता से जुड़ा मामला बताया। उनका कहना है कि यह मामला केवल हिजाब तक सीमित नहीं है, बल्कि एक लड़की को अपनी पसंद के कपड़े पहनने की स्वतंत्रता से भी जुड़ा हुआ है।

साजिद रशीदी ने कहा कि जिस छात्रा ने दसवीं कक्षा तक उसी स्कूल में हिजाब पहनकर पढ़ाई की, उसे 11वीं कक्षा में अचानक हिजाब पहनने से रोक दिया गया। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर छात्रा इतने वर्षों तक स्कूल के नियमों के बीच हिजाब पहनकर पढ़ती रही, तो 11वीं कक्षा में ऐसा क्या बदल गया कि उसे रोक दिया गया।

उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट को इस पहलू पर भी विचार करना चाहिए था कि छात्रा को पहले हिजाब पहनकर पढ़ने की अनुमति थी और बाद में उसे इससे रोका गया।

पसंद के कपड़े पहनने की आजादी क्यों?

मौलाना साजिद रशीदी ने हिजाब को लेकर अदालत में रखे गए धार्मिक पहलू पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि अगर यह मान भी लिया जाए कि हिजाब इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है, तब भी लड़की की व्यक्तिगत पसंद का अधिकार खत्म नहीं हो जाता।

उन्होंने कहा कि अगर कोई लड़की अपनी इच्छा से हिजाब पहनना चाहती है तो उसे अपनी पसंद के मुताबिक कपड़े पहनने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोगों के दिमाग में इस्लामोफोबिया है, जिसके कारण हिजाब को लेकर विवाद खड़ा किया जा रहा है।

लड़की अपनी मर्जी से कपड़े पहनना चाहती है तो उसे मना न करें

साजिद रशीदी ने कहा कि इस मामले को केवल स्कूल ड्रेस कोड के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। उनका कहना है कि अगर कोई लड़की अपनी इच्छा से किसी तरह का परिधान पहनना चाहती है और उससे किसी अन्य व्यक्ति के अधिकार प्रभावित नहीं हो रहे हैं, तो उसे रोकना उचित नहीं है। उन्होंने इसे धार्मिक स्वतंत्रता और इंसान की आजादी से जुड़ा विषय बताया।

मौलाना अब्बास ने फैसले पर पुनर्विचार की अपील की

शिया धर्मगुरु मौलाना यासूब अब्बास ने भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर असहमति जताई है। उन्होंने अदालत से फैसले पर पुनर्विचार करने की अपील की है।यासूब अब्बास का कहना है कि हिजाब पहनने पर रोक नहीं लगाई जा सकती। उनके मुताबिक, भारत का संविधान नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता देता है और किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान या आस्था से जुड़े पहनावे को इसी संवैधानिक अधिकार के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यासूब अब्बास ने कहा कि पहले संविधान से मजहबी आजादी को हटा दें, फिर ऐसे फैसले आएं। उनका यह बयान हाईकोर्ट के फैसले को लेकर उनकी असहमति को जाहिर करता है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला ऐसे समय आया है जब स्कूलों में ड्रेस कोड और विद्यार्थियों के धार्मिक पहनावे को लेकर देश में पहले से बहस होती रही है। मौजूदा मामले में अदालत ने निजी स्कूल के ड्रेस कोड को महत्वपूर्ण माना है, जबकि मुस्लिम धर्मगुरुओं ने इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धार्मिक अधिकार के बड़े सवाल से जोड़कर देखा है।

इस मामले में दो अलग-अलग नजरिए सामने आ रहे हैं। एक ओर स्कूल की यूनिफॉर्म, संस्थान के अनुशासन और समान ड्रेस कोड का मुद्दा है, वहीं दूसरी ओर धर्मगुरु छात्रा की व्यक्तिगत पसंद और धार्मिक स्वतंत्रता को महत्व देने की बात कह रहे हैं।

मौलाना साजिद रशीदी और मौलाना यासूब अब्बास के बयानों से साफ है कि वे हाईकोर्ट के फैसले से सहमत नहीं हैं और इसे केवल स्कूल यूनिफॉर्म का मामला नहीं, बल्कि धार्मिक और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा मुद्दा मान रहे हैं।

रिपोर्ट- फरमान अब्बास मन्जुल

Share.
Leave A Reply

© 2026 Nation27

Exit mobile version