आजादी के 78 साल बाद भी कानपुर देहात का एक इलाका ऐसा है, जहां हजारों लोग लकड़ी और बांस के सहारे अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर नदी पार करते हैं। उत्तर प्रदेश में दशकों तक अलग-अलग सरकारें आईं और गईं, आखिर एक गांव विकास से बाहर क्यों रह गया?
उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात के रसूलाबाद विकासखंड स्थित ग्राम पंचायत मिर्जापुर लकोठिया मजरा बंदरहा में पांडु नदी पर कोई पुल नहीं है। मजबूरी में ग्रामीणों ने वर्षों पहले आरसीसी के खंभों पर लकड़ी और बांस का एक अस्थायी पुल बनाया था। समय बीतता गया और पुल Bridge जर्जर हो गया।
बंदरहा, बकीठिया, लकोठिया, कोला और पछियान पुरवा समेत दर्जनों गांवों के हजारों लोगों की जिंदगी इसी पुल पर टिकी है। अगर मौत का दरिया बिना पार किये मूलभूत सुविधाओं के लिए करीब 15 किलोमीटर का चक्कर लगाकर सफर तय करना पड़ता है। इसलिए लोग हर दिन मौत को चुनौती देकर इसी लकड़ी और बांस के बने पुल से गुजरते हैं।
जर्जर हो चुके पुल की सबसे बड़ी कीमत स्कूली बच्चे चुका रहे हैं। स्कूल के लिए रोज इसी पुल से गुजरना पड़ता है। बरसात में अभिभावक खुद बच्चों को पुल तक छोड़ने आते हैं। स्कूल की छुट्टी के समय पुल के पास बच्चो के वापस आने का इंतजार करते है और बच्चो के आने पर सभी अभिभावक बच्चो के बैग अपने कंधों पर टांग बच्चो को पुल पार कराते है।
मरीजों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों के लिए हर आपातकाल एक परीक्षा बन जाता है। किसान भी अपनी मेहनत की फसल बाजार तक पहुंचाने के लिए इसी रास्ते पर निर्भर हैं। और अब ये उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गया है क्योंकि वोट लेने के बाद किसी जनप्रतिनिधि ने उनकी सुध नही ली।
यहाँ की स्थानीय भाजपा विधायक है पूनम संखवार है और सांसद है समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव इसके बाद भी यह पुल अपने अस्तित्व के लिए टकटकी लगाए जनप्रतिनिधियों की तरफ निहार रहा है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आज़ादी के बाद उत्तर प्रदेश में लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दलों की सरकारें रहीं। हर चुनाव में विकास के वादे होते है। लेकिन इस पुल का सपना आज भी अधूरा है।
आखिर योजनाएं फाइलों में क्यों अटकी रहीं? किस स्तर पर देरी हुई? और इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? इन सवालों का जवाब आज भी हजारों ग्रामीणों को नहीं मिला है। फिलहाल रसूलाबाद से भाजपा विधायक पूनम संखवार ने पुल का प्रस्ताव भेजने की बात कही है लेकिन कब ये सपना साकार होगा ये देखने वाली बात है।
यह शिक्षा, स्वास्थ्य, खेती और रोज़मर्रा की जिंदगी को जोड़ने वाली जीवनरेखा है। सवाल किसी एक सरकार का नहीं है। बल्कि उन तमाम व्यवस्थाओं का है, जिन्होंने दशकों तक इस जरूरत को प्राथमिकता नहीं दी। अब देखना होगा कि इस बार मिला आश्वासन हकीकत बनेगा या फिर यह पुल अगले चुनाव तक सिर्फ एक और वादा बनकर रह जाएगा।

