लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां धीरे-धीरे तेज हो रही हैं और इसके साथ ही करीब दो दशक से राज्य की चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला मुस्लिम वोटर एक बार फिर राजनीतिक दलों के फोकस में है। सवाल यह है कि 2027 में यूपी का मुस्लिम मतदाता किस मुद्दे पर वोट करेगा और उसके सामने कौन-कौन से राजनीतिक विकल्प होंगे?
फिलहाल ऐसा कोई व्यापक और विश्वसनीय सर्वे सामने नहीं आया है, जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि मुस्लिम मतदाताओं का रुख किसी एक पार्टी के पक्ष में तय हो चुका है। हालांकि 2022 के विधानसभा चुनाव, 2024 के लोकसभा चुनाव और मौजूदा राजनीतिक गतिविधियों से कुछ संकेत जरूर मिलते हैं।
2027 में सिर्फ ‘किसे हराना है’ नहीं, ‘किसे चुनना है’ भी सवाल
पिछले चुनावों में मुस्लिम मतदाताओं के बीच भाजपा के खिलाफ रणनीतिक मतदान की चर्चा प्रमुख रही है। 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में भाजपा को मुस्लिम मतदाताओं का सीमित समर्थन मिलने की बात सामने आई थी। वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में यूपी में विपक्षी गठबंधन के बेहतर प्रदर्शन ने मुस्लिम वोट के राजनीतिक महत्व को फिर चर्चा में ला दिया। अब 2027 में बड़ा सवाल यह है कि क्या मुस्लिम मतदाता एक बार फिर किसी एक विपक्षी विकल्प के पीछे रणनीतिक रूप से लामबंद होगा या स्थानीय उम्मीदवार, क्षेत्रीय समीकरण और मुद्दों के आधार पर अलग-अलग सीटों पर फैसला करेगा।
यूपी की 46 सीटों पर खास नजर
2026 में सामने आए एक चुनावी विश्लेषण के मुताबिक, यूपी की 46 विधानसभा सीटों को निर्वाचन आयोग की ओर से ‘उर्दू भाषी’ सीटों के रूप में चिन्हित किया गया है। इन सीटों पर मुस्लिम आबादी की अच्छी मौजूदगी है और 2027 में इन क्षेत्रों का राजनीतिक रुख खास तौर पर महत्वपूर्ण हो सकता है। इन सीटों पर सिर्फ धार्मिक पहचान ही नहीं, बल्कि उम्मीदवार की स्थानीय पकड़, जातीय समीकरण, पार्टी संगठन और विपक्षी वोटों के बंटवारे का भी असर देखने को मिलेगा।
रोजगार और महंगाई भी बड़े मुद्दे
मुस्लिम मतदाता को केवल धार्मिक या पहचान से जुड़े मुद्दों के नजरिये से देखना राजनीतिक रूप से अधूरा विश्लेषण होगा। रोजगार, महंगाई, कारोबार, शिक्षा, सरकारी योजनाओं का लाभ और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे भी चुनावी फैसले को प्रभावित कर सकते हैं।
खास तौर पर शहरी इलाकों में छोटे कारोबार, रोजगार और शिक्षा से जुड़े सवाल महत्वपूर्ण हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में आय, खेती, रोजगार और सरकारी योजनाओं तक पहुंच जैसे मुद्दे अहम हो सकते हैं। युवा मतदाताओं का रुख भी 2027 में महत्वपूर्ण रहेगा। यूपी के अलग-अलग हिस्सों से सामने आ रही चुनावी चर्चाओं में नई पीढ़ी के मतदाताओं के बीच रोजगार, शिक्षा और विकास जैसे मुद्दों की अहमियत बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं।
कानून-व्यवस्था पर भी रहेगी नजर
योगी आदित्यनाथ सरकार के कार्यकाल में कानून-व्यवस्था और अपराध पर कार्रवाई लगातार राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रही है। मुस्लिम मतदाताओं के बीच इस मुद्दे को लेकर राय एक जैसी होना जरूरी नहीं है। एक तरफ कानून-व्यवस्था को लेकर सरकार के समर्थक उसके प्रदर्शन को मुद्दा बना सकते हैं, वहीं दूसरी तरफ पुलिस कार्रवाई, बुलडोजर कार्रवाई और अल्पसंख्यकों से जुड़े मामलों को लेकर विपक्ष के सवाल भी चुनावी बहस का हिस्सा रह सकते हैं। यही वजह है कि 2027 में मुस्लिम मतदाता के रुख को केवल ‘भाजपा के पक्ष या विपक्ष’ में बांटना आसान नहीं होगा।
सपा की सबसे बड़ी चुनौती अपना आधार बनाए रखना
समाजवादी पार्टी मुस्लिम मतदाताओं के बीच लंबे समय से मजबूत राजनीतिक आधार रखती है। 2024 के लोकसभा चुनाव में यूपी में सपा-कांग्रेस गठबंधन के प्रदर्शन ने इस आधार को फिर चर्चा में ला दिया। लेकिन 2027 विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव से अलग होगा। स्थानीय उम्मीदवार, सीटों का बंटवारा, गठबंधन और क्षेत्रीय समीकरण परिणामों पर बड़ा असर डालेंगे। ऐसे में सपा के सामने मुस्लिम मतदाताओं के भरोसे को बनाए रखने के साथ-साथ गैर-मुस्लिम पिछड़े और दलित मतदाताओं के बीच भी अपना समर्थन मजबूत करने की चुनौती होगी।
कांग्रेस की भूमिका पर भी नजर
कांग्रेस के लिए मुस्लिम मतदाता 2027 में दो वजहों से महत्वपूर्ण हो सकता है। पहली, पार्टी को 2024 के लोकसभा चुनाव में यूपी में गठबंधन के जरिए फायदा मिला। दूसरी, यदि कांग्रेस और सपा के बीच विधानसभा चुनाव में सीटों और रणनीति को लेकर बेहतर तालमेल होता है तो मुस्लिम वोट का बंटवारा रोकने की कोशिश की जा सकती है। हालांकि कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह यूपी में अपने संगठन और जमीनी प्रभाव को कितना मजबूत कर पाती है।
बसपा और ओवैसी का फैक्टर कितना असर डालेगा?
बहुजन समाज पार्टी भी मुस्लिम मतदाताओं के लिए एक संभावित विकल्प बनी हुई है, खासकर उन सीटों पर जहां स्थानीय सामाजिक समीकरण उसके पक्ष में हों। दूसरी ओर AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की सक्रियता भी विपक्षी वोटों के संभावित बंटवारे को लेकर चर्चा में है। जुलाई 2026 में ओवैसी ने मुरादाबाद की एक सभा में 2027 के लिए समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन की संभावना के संकेत दिए थे। यदि ऐसा कोई गठबंधन आकार लेता है तो कई मुस्लिम बहुल सीटों पर चुनावी समीकरण बदल सकते हैं।
फरमान अब्बास मन्जुल

