लखनऊ। यूपी रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी यानी यूपी रेरा के आदेश के अनुपालन में देरी और रिकवरी सर्टिफिकेट से कम रकम का चेक देने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने आवास आयुक्त को तलब करते हुए 25 अगस्त को सुबह 10:15 बजे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश होकर जवाब देने का आदेश दिया है। न्यायमूर्ति राजन राय और न्यायमूर्ति मंजिव शुक्ला की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि संबंधित अधिकारी यूपी रेरा और हाईकोर्ट की कार्यवाही को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। मामला शिकायतकर्ता अशोक कुमार सिंह की याचिका से जुड़ा है।

29 जुलाई 2025 को यूपी रेरा ने दिया था आदेश

मामले में अशोक कुमार सिंह की शिकायत पर यूपी रेरा ने 29 जुलाई 2025 को उनके पक्ष में फैसला सुनाया था। आदेश के अनुपालन की कार्रवाई के दौरान यूपी रेरा ने 27 मई 2026 को 26,58,806.01 रुपये का रिकवरी सर्टिफिकेट जारी किया। लेकिन आरोप है कि इस रिकवरी सर्टिफिकेट के आधार पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। रकम की वसूली में देरी के बाद शिकायतकर्ता को हाईकोर्ट का रुख करना पड़ा।

हाईकोर्ट ने 10 दिन में भुगतान का दिया था आदेश

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने 7 अगस्त को उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद को देय रकम 10 दिन के भीतर जमा करने का निर्देश दिया था। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि आदेश का अनुपालन नहीं होने पर आवास आयुक्त को अदालत के सामने पेश होना पड़ेगा। इसके बाद परिषद की ओर से हाईकोर्ट में अनुपालन हलफनामा दाखिल किया गया। इसमें बताया गया कि हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार, लखनऊ खंडपीठ के नाम 23,71,126 रुपये का चेक तैयार किया गया है, जिसे याची के अधिवक्ता को सौंपा जा रहा है।

अदालत ने सवाल उठाया कि जब यूपी रेरा की ओर से जारी रिकवरी सर्टिफिकेट में 26.58 लाख रुपये से अधिक की रकम निर्धारित की गई है तो परिषद ने केवल 23.71 लाख रुपये का चेक क्यों जारी किया गया। परिषद की ओर से जवाब दिया गया कि रकम का निर्धारण विभाग की अपनी गणना के आधार पर किया गया है। लेकिन कोर्ट यह जानना चाहता था कि जब एक वैधानिक प्राधिकरण यानी यूपी रेरा ने रिकवरी सर्टिफिकेट जारी कर रकम निर्धारित कर दी है तो उसके विपरीत विभाग अपनी अलग गणना किस आधार पर कर सकता है। कोर्ट के सामने इस संबंध में कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया जा सका। इतना ही नहीं, अनुपालन हलफनामे के साथ रकम की गणना का पूरा विवरण भी संलग्न नहीं किया गया था।

अब आवास आयुक्त को देना होगा जवाब

हाईकोर्ट ने इस पूरे रवैये पर नाराजगी जाहिर करते हुए आवास आयुक्त को व्यक्तिगत रूप से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश होने का आदेश दिया है। अदालत यह जानना चाहती है कि यूपी रेरा के रिकवरी सर्टिफिकेट में निर्धारित रकम से कम राशि का चेक किस आधार पर तैयार किया गया और आदेश के अनुपालन में इतनी देरी क्यों हुई। हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि तैयार चेक की रकम नियमानुसार याची को जारी की जा सकती है। इसके लिए याची को आवश्यक आवेदन देना होगा और इसके लिए किसी अलग आदेश की प्रतीक्षा नहीं करनी होगी।

RERA के आदेशों के अनुपालन पर बड़ा सवाल

यह मामला सिर्फ एक होमबायर की रकम से जुड़ा विवाद नहीं है, बल्कि RERA के आदेशों के प्रभावी अनुपालन को लेकर भी अहम सवाल खड़े करता है। रियल एस्टेट मामलों में खरीदारों को राहत देने के लिए RERA के आदेश के बाद रिकवरी की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में यदि रिकवरी सर्टिफिकेट जारी होने के बावजूद वसूली में देरी होती है या निर्धारित रकम से अलग भुगतान की गणना की जाती है तो इससे आदेश के क्रियान्वयन पर सवाल उठना स्वाभाविक है। फिलहाल हाईकोर्ट की सख्ती के बाद अब सबकी निगाहें आवास आयुक्त के जवाब और परिषद की ओर से दी जाने वाली सफाई पर हैं। मंगलवार की सुनवाई में यह स्पष्ट हो सकता है कि 26.58 लाख रुपये के रिकवरी सर्टिफिकेट के मुकाबले 23.71 लाख रुपये का भुगतान किस आधार पर तय किया गया था।

रिपोर्ट- फरमान अब्बास मन्जुल, लखनऊ

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