सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के करियर और वैवाहिक अधिकारों को लेकर एक अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि पत्नी का अपने पेशेवर सपनों को पूरा करने की कोशिश करना वैवाहिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। सिर्फ इसलिए कि पत्नी अपने करियर पर ध्यान दे रही है और इससे पति की भावनाएं आहत हो रही हैं, इसे तलाक के लिए क्रूरता या परित्याग का आधार नहीं बनाया जा सकता।

पत्नी का करियर वैवाहिक क्रूरता नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि एक योग्य महिला का अपने पेशे को आगे बढ़ाना उसका अधिकार है। अदालत ने माना कि पत्नी का करियर बनाना या बच्चे के लिए स्थिर माहौल तैयार करना शादी में क्रूरता या desertion नहीं माना जा सकता। इस टिप्पणी को वैवाहिक कानून और लैंगिक समानता के लिहाज से अहम माना जा रहा है।

निचली अदालतों की सोच पर सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी

मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैमिली कोर्ट और गुजरात हाई कोर्ट की टिप्पणियों पर भी आपत्ति जताई। अदालत ने कहा कि पत्नी के करियर को तलाक का आधार मानना रूढ़िवादी और पुराने सामाजिक नजरिए को दिखाता है। कोर्ट ने ऐसी सोच को महिलाओं के अधिकारों और समानता की भावना के खिलाफ माना।

पति ने लगाया था क्रूरता और परित्याग का आरोप

यह मामला एक दंपति से जुड़ा था, जिनकी शादी 2009 में हुई थी। पत्नी डेंटिस्ट थी और पति भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल था। वैवाहिक विवाद के दौरान पति ने पत्नी पर क्रूरता और परित्याग के आरोप लगाए थे। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इन आरोपों को पत्नी के करियर से जोड़कर सही मानने से इनकार कर दिया।

तलाक मंजूर, लेकिन वजह अलग

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में तलाक को बरकरार रखा, लेकिन वजह पत्नी का करियर या कथित क्रूरता नहीं मानी। अदालत ने तलाक को शादी के पूरी तरह टूट जाने यानी irretrievable breakdown of marriage के आधार पर स्वीकार किया। यानी कोर्ट ने साफ कर दिया कि वैवाहिक संबंध खत्म हो सकते हैं, लेकिन महिला के करियर को दोष बनाना सही नहीं है।

लैंगिक समानता पर बड़ा संदेश

इस फैसले ने एक बड़ा सामाजिक संदेश दिया है। अदालत ने माना कि विवाह के बाद भी महिला की पहचान, करियर और पेशेवर सपने खत्म नहीं होते। पति-पत्नी का रिश्ता समानता, सम्मान और सहयोग पर आधारित होना चाहिए, न कि इस सोच पर कि पत्नी को करियर छोड़कर सिर्फ वैवाहिक अपेक्षाओं के अनुसार चलना होगा।

फैसले का व्यापक असर

कानूनी जानकारों के अनुसार, यह टिप्पणी आने वाले वैवाहिक विवादों में महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकती है। खासकर उन मामलों में, जहां महिलाओं के नौकरी करने, करियर बनाने या स्वतंत्र निर्णय लेने को विवाद का कारण बताया जाता है। सुप्रीम कोर्ट का यह रुख बताता है कि शादी महिला की पेशेवर आजादी को सीमित करने का आधार नहीं बन सकती।

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