उत्तराखंड भाजपा के संगठन महामंत्री अजय कुमार को अब राजस्थान का संगठन महामंत्री नियुक्त किया गया है। अजय कुमार ने पिछले लगभग सात साल तक उत्तराखंड में संगठन कार्य संभाला। राष्ट्रीय अध्यक्ष के तीन दिवसीय दौरे के दौरान कई वरिष्ठ नेताओं ने अजय कुमार के बारे में अपनी राय साझा की थी। खबरों के अनुसार, पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता नहीं चाहते थे कि वह उत्तराखंड में बने रहें। उत्तराखंड भाजपा में संगठन महामंत्री अजय कुमार को लेकर पार्टी के भीतर असंतोष सामने आया था। बताया जा रहा है कि कई वरिष्ठ नेता नहीं चाहते थे कि वे अब राज्य में अपनी जिम्मेदारी जारी रखें। इसी दौरान राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के तीन दिवसीय दौरे में वरिष्ठ नेताओं ने अजय कुमार के कार्यकाल को लेकर अपना फीडबैक साझा किया। मामले की गंभीरता को देखते हुए पार्टी नेतृत्व ने निर्णय लेते हुए अजय कुमार को उत्तराखंड से हटाकर सम्मानजनक तरीके से राजस्थान का संगठन महामंत्री नियुक्त कर दिया। अजय कुमार ने सितंबर 2019 में संगठन महामंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली थी। लगभग सात वर्षों के कार्यकाल में उन्होंने संगठन की गहरी समझ विकसित की। विवादों को अलग रखें तो उनका चुनावी प्रदर्शन काफी प्रभावशाली रहा है। उनके कार्यकाल में भाजपा ने विधानसभा चुनाव, 2024 के लोकसभा चुनाव के साथ-साथ निकाय और पंचायत चुनावों में भी मजबूत प्रदर्शन करते हुए उल्लेखनीय सफलता हासिल की। बावजूद इसके पिछले कुछ दिनों से अंकिता भंडारी प्रकरण में अजय कुमार का नाम घसीटे जाने, राज्य में हुए घटनाक्रमों, सामाजिक ताने-बाने, जनभावनाओं को देखते हुए कहीं न कहीं कई वरिष्ठ नेता चिंतित थे। उन्हें ये भी चिंता थी कि कहीं आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी को इसका नुकसान न हो। वो भी तब जबकि विपक्षी कांग्रेस और यूकेडी अंकिता भंडारी मामले को लगातार मुद्दा बनाए हुए हैं और कोर्ट के फैसले से संतुष्ट नहीं हैं।
पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से भी अलग से बात की
राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने राज्य पहुंचने के बाद सबसे पहले कोर कमेटी की बैठक की। इसके बाद उन्होंने मंत्रियों और विभिन्न संगठनात्मक इकाइयों के साथ अलग-अलग बैठकें भी कीं। साथ ही, उन्होंने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से व्यक्तिगत रूप से बातचीत की। बताया जा रहा है कि कई वरिष्ठ नेताओं का मानना था कि अजय कुमार लंबे समय से यहां कार्यरत हैं, इसलिए अब उनके स्थानांतरण का समय आ गया है। अब नए महामंत्री संगठन के आने के बाद ये कुर्सी तो खाली है लेकिन इस पर चुनौतियां जरूर विराजमान हो गई हैं। अगला विधानसभा चुनाव सिर पर है तो आने वाले महामंत्री के लिए प्रदेश का सांगठनिक, भौगोलिक, सामाजिक और राजनीतिक हालातों को समझना होगा। 70 विधानसभा सीटों पर संगठनात्मक पकड़ बनाने, यहां के नेताओं को समझने, जनभावनाओं को ठीक से समझने की भी चुनौती होगी।


