भारत-नेपाल की खुली सीमा एक बार फिर सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का बड़ा कारण बनती नजर आ रही है। नेपाल में शरण लेने वाले 321 रोहिंग्या शरणार्थियों का अब तक पता नहीं चल पाया है। सुरक्षा एजेंसियों को आशंका है कि इनमें से कुछ लोग अपनी पहचान बदलकर नेपाल में ही रह रहे हो सकते हैं, जबकि कुछ के भारत में दाखिल होने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा रहा है।
भारत और नेपाल के बीच लंबी खुली सीमा होने के कारण दोनों देशों के नागरिकों की आवाजाही काफी आसान है।
यही वजह है कि सुरक्षा एजेंसियों के लिए यह पता लगाना चुनौती बन जाता है कि कौन व्यक्ति सामान्य आवाजाही के तहत सीमा पार कर रहा है और कौन किसी गलत मकसद से भारत में प्रवेश कर रहा है। हाल के वर्षों में नेपाल के रास्ते भारत में दाखिल होने वाले विदेशी नागरिकों की गिरफ्तारी के कई मामले सामने आए हैं। इन घटनाओं ने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता और बढ़ा दी है।
निचलौल और गोरखपुर में हुई गिरफ्तारियों से बढ़ी चिंता
नेपाल के रास्ते भारत में घुसपैठ की आशंका को लेकर सुरक्षा एजेंसियों की नजर खास तौर पर उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिलों पर है। 11 मार्च 2025 को महराजगंज के निचलौल इलाके में बांग्लादेशी नागरिक सैफुल इस्लाम को गिरफ्तार किया गया था। इसके अलावा 5 सितंबर 2024 को गोरखपुर के बरगदवां इलाके में मोहम्मद खुकन मियां और रुबेल अहमद की गिरफ्तारी भी हुई थी।
इन मामलों ने सुरक्षा एजेंसियों को यह सोचने पर मजबूर किया कि नेपाल के रास्ते सिर्फ भारत में आने वाले सामान्य यात्रियों की निगरानी ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन लोगों की गतिविधियों पर भी नजर रखने की जरूरत है, जो नेपाल पहुंचने के बाद बिना स्पष्ट रिकॉर्ड के आगे बढ़ जाते हैं। जांच एजेंसियां इस बात को समझने की कोशिश करती हैं कि ऐसे लोगों का भारत आने का मकसद क्या था, वे किसके संपर्क में थे और सीमा पार करने के लिए उन्होंने किस रूट का इस्तेमाल किया।
2019 में नेपाल पहुंचे थे 321 रोहिंग्या
सबसे ज्यादा चिंता उन 321 रोहिंग्या शरणार्थियों को लेकर जताई जा रही है, जो 2019 में नेपाल पहुंचे थे, लेकिन अब उनका पता नहीं चल रहा है। सुरक्षा एजेंसियों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर ये लोग फिलहाल कहां हैं। संभावना यह भी जताई जा रही है कि कुछ लोग नेपाल में ही दूसरी पहचान के साथ रह रहे हों।
वहीं, यह आशंका भी जांच के दायरे में है कि इनमें से कुछ लोग नेपाल से भारत की ओर बढ़े हों। हालांकि, किसी भी व्यक्ति के भारत में प्रवेश करने की पुष्टि बिना जांच के नहीं की जा सकती। इसलिए एजेंसियां इन मामलों में रिकॉर्ड, पहचान और सीमा पार आवाजाही से जुड़े डेटा को खंगाल रही हैं।
722 विदेशी नागरिकों का भी नहीं मिल रहा पता
रोहिंग्या शरणार्थियों के अलावा नेपाल में पर्यटक वीजा पर पहुंचे पाकिस्तान, बांग्लादेश और तुर्किए के 722 नागरिकों का पता नहीं लगना भी सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है। पर्यटक वीजा पर किसी देश में प्रवेश करने वाले व्यक्ति के बारे में आम तौर पर उसके ठहरने और बाहर निकलने का रिकॉर्ड मौजूद रहता है।
ऐसे में बड़ी संख्या में विदेशी नागरिकों का ट्रेस न होना सुरक्षा व्यवस्था के सामने सवाल खड़े करता है। एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि इन लोगों ने नेपाल में अपने निर्धारित ठिकानों पर रहना जारी रखा या फिर किसी दूसरे रास्ते से वहां से निकल गए।
सिर्फ बांग्लादेश नहीं, कई देशों के नागरिक पकड़े गए
नेपाल सीमा के जरिए भारत में प्रवेश करने की कोशिश के मामलों में सिर्फ बांग्लादेशी नागरिकों का नाम सामने नहीं आया है। बीते दो वर्षों के दौरान नेपाल सीमा के रास्ते भारत में प्रवेश करते समय नीदरलैंड, चीन, ईरान, ब्राजील, श्रीलंका, जर्मनी, ब्रिटेन और उज्बेकिस्तान समेत कई देशों के नागरिक पकड़े जा चुके हैं। सुरक्षा एजेंसियों के लिए यह इसलिए भी अहम है क्योंकि अलग-अलग देशों के नागरिकों का इस रूट से भारत पहुंचना सीमा की निगरानी को लेकर नए सवाल खड़े करता है। हर व्यक्ति का भारत में आने का मकसद एक जैसा नहीं हो सकता, इसलिए एजेंसियां हर मामले की अलग-अलग जांच करती हैं।
खुली सीमा बनी सबसे बड़ी चुनौती
भारत और नेपाल के बीच सीमा व्यवस्था बाकी कई अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से अलग है। दोनों देशों के नागरिकों को कई हिस्सों में अपेक्षाकृत आसानी से आवाजाही की सुविधा मिलती है। यह व्यवस्था दोनों देशों के बीच पुराने सामाजिक और आर्थिक रिश्तों का हिस्सा है, लेकिन इसी खुली सीमा का गलत फायदा उठाने की आशंका भी लगातार बनी रहती है। सीमावर्ती इलाकों में कई ऐसे रास्ते हैं, जहां से स्थानीय लोग रोजमर्रा की जरूरतों के लिए आते-जाते हैं।
ऐसे में किसी बाहरी व्यक्ति की पहचान करना सुरक्षा बलों के लिए आसान काम नहीं होता। यही वजह है कि सुरक्षा एजेंसियां अब सिर्फ सीमा पर निगरानी तक सीमित नहीं रहना चाहतीं, बल्कि सीमा पार से आने वाले संदिग्ध लोगों के नेटवर्क, दस्तावेजों और ठिकानों की भी जांच पर जोर दे रही हैं।
सुरक्षा एजेंसियां कर रहीं रिकॉर्ड की जांच
लापता शरणार्थियों और नेपाल में ट्रेस नहीं हो रहे विदेशी नागरिकों को लेकर एजेंसियां अलग-अलग स्तर पर जानकारी जुटा रही हैं। इसमें यात्रा दस्तावेज, वीजा रिकॉर्ड, सीमा से जुड़ी जानकारी और संभावित ठिकानों की जांच शामिल है। इसके अलावा यह भी देखा जा रहा है कि कहीं किसी व्यक्ति ने फर्जी दस्तावेज या बदली हुई पहचान के जरिए भारत या नेपाल में प्रवेश तो नहीं किया। सुरक्षा एजेंसियों के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले दस्तावेजी सबूत और ग्राउंड इनपुट को मिलाया जाए।
सीमावर्ती जिलों पर बढ़ सकती है निगरानी
महराजगंज, सिद्धार्थनगर, गोरखपुर और आसपास के सीमावर्ती इलाकों में सुरक्षा को लेकर पहले से ही सतर्कता रहती है। नेपाल से आने-जाने वाले लोगों की गतिविधियों पर नजर रखना और संदिग्ध मामलों की जानकारी संबंधित एजेंसियों तक पहुंचाना स्थानीय सुरक्षा तंत्र के लिए अहम है। जानकारों का मानना है कि नेपाल सीमा पर सुरक्षा मजबूत करने का मतलब यह नहीं है कि आम लोगों की आवाजाही को मुश्किल बना दिया जाए। चुनौती यह है कि दोनों देशों के बीच सामान्य आवाजाही बनी रहे और साथ ही संदिग्ध गतिविधियों पर प्रभावी तरीके से रोक लगाई जा सके।
घुसपैठ के साथ फर्जी पहचान भी बड़ी चुनौती
सुरक्षा एजेंसियों के सामने सिर्फ अवैध तरीके से सीमा पार करने की चुनौती नहीं है। फर्जी दस्तावेज, बदली हुई पहचान और अलग-अलग देशों के नागरिकों का एक जगह से दूसरी जगह पहुंचना भी जांच का अहम हिस्सा बन गया है। अगर कोई व्यक्ति नेपाल में प्रवेश करने के बाद अपने तय पते पर नहीं मिलता और उसके बाद उसका कोई रिकॉर्ड नहीं रहता, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि वह आखिर कहां गया। इसी तरह किसी विदेशी नागरिक के भारत पहुंचने पर उसकी पहचान और यात्रा के मकसद की जांच करना भी जरूरी हो जाता है।
321 लापता रोहिंग्या शरणार्थियों और नेपाल में ट्रेस नहीं हो रहे विदेशी नागरिकों को लेकर सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हैं। हालांकि, इनके भारत में होने की बात अभी सिर्फ आशंका के स्तर पर है और इसकी पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी। लेकिन इन मामलों ने एक बात साफ कर दी है कि भारत-नेपाल की खुली सीमा पर सुरक्षा व्यवस्था को लगातार मजबूत करने की जरूरत है। सामान्य आवाजाही और सीमा सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना ही आने वाले समय में एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती रहने वाला है।


