बरेली हिंसा मामले में मौलाना तौकीर रजा खान को इलाहाबाद हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली है। कोर्ट ने हिंसा के मुख्य आरोपियों में शामिल तौकीर रजा और डॉ. नफीस की जमानत अर्जी खारिज कर दी। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति आशुतोष श्रीवास्तव की अदालत ने ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक ही सजा, सर तन से जुदा’ जैसे नारे को लेकर सख्त टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के नारे को ‘नारा-ए-तकबीर, अल्लाहु अकबर’, ‘जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’, ‘जय श्री राम’ या ‘हर-हर महादेव’ जैसे धार्मिक उद्घोषों के समान नहीं माना जा सकता।

अदालत ने साफ कहा कि ऐसे नारे कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकते हैं। किसी धार्मिक या राजनीतिक संदर्भ में लगाए जाने वाले नारे और किसी व्यक्ति के खिलाफ हिंसा या जान लेने की धमकी देने वाले नारे के बीच अंतर समझना जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि कानून व्यवस्था बिगाड़ने वाले कृत्यों को न्यायिक संरक्षण नहीं दिया जा सकता।

यह मामला 26 सितंबर 2025 को बरेली में हुई हिंसा से जुड़ा है। घटना को लेकर कोतवाली थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी। पुलिस के मुताबिक, तौकीर रजा पर आरोप है कि उन्होंने मुस्लिम समुदाय से जुड़े मुद्दों को लेकर लोगों को प्रदर्शन के लिए जुटने का आह्वान किया था। पुलिस का दावा है कि इस्लामिया इंटर कॉलेज के मैदान में लोगों को इकट्ठा होने की अपील की गई थी, जबकि प्रशासन की ओर से इसकी अनुमति नहीं थी। इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोग वहां पहुंचे।

पुलिस के अनुसार, भीड़ को रोकने और स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश की गई तो हालात बिगड़ गए। आरोप है कि भीड़ की तरफ से पुलिस पर पथराव किया गया। इस दौरान ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाए गए और पेट्रोल बम फेंके जाने तथा फायरिंग की बात भी एफआईआर में सामने आई। हिंसा में कई पुलिसकर्मियों के घायल होने और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचने का आरोप है।

पुलिस और अभियोजन पक्ष का कहना है कि तौकीर रजा ने 19 सितंबर 2025 को हुई एक बैठक में लोगों से शुक्रवार की नमाज के बाद इस्लामिया इंटर कॉलेज के मैदान में पहुंचने की अपील की थी। पुलिस के मुताबिक, इस जुटान के लिए प्रशासन से अनुमति नहीं ली गई थी। अभियोजन पक्ष ने कोर्ट में यह भी कहा कि हिंसा के बाद तौकीर रजा ने सह-आरोपी के घर से वीडियो संदेश जारी किया था। राज्य सरकार का दावा है कि वीडियो के जरिए उन्होंने बड़ी संख्या में वहां पहुंचने वाले लोगों को धन्यवाद दिया और उनके कृत्यों की सराहना की। इन्हीं आरोपों के आधार पर पुलिस ने तौकीर रजा को मामले में मुख्य आरोपी बनाया। वह 27 सितंबर 2025 से जेल में हैं।

तौकीर रजा की ओर से पेश अधिवक्ता ने कोर्ट में उनकी गिरफ्तारी और लंबे समय से जेल में रहने का हवाला देते हुए जमानत की मांग की। बचाव पक्ष का कहना था कि तौकीर रजा निर्दोष हैं और उन्हें राजनीतिक दुर्भावना के चलते मामले में फंसाया गया है। वकील ने यह भी दलील दी कि उन्होंने किसी तरह की हिंसा के लिए लोगों को नहीं उकसाया था। उनका कहना था कि जिस समय बरेली में हिंसा हुई, उस समय तौकीर रजा मौके पर मौजूद भी नहीं थे। बचाव पक्ष के अनुसार, 26 सितंबर को उन्हें उनके घर में नजरबंद कर दिया गया था।

राज्य सरकार की तरफ से अपर महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने जमानत अर्जी का विरोध किया। सरकार की ओर से कहा गया कि तौकीर रजा की भूमिका केवल प्रदर्शन के आह्वान तक सीमित नहीं थी। अभियोजन पक्ष ने 19 सितंबर की बैठक का हवाला देते हुए कहा कि लोगों से शुक्रवार की नमाज के बाद इस्लामिया इंटर कॉलेज के मैदान में पहुंचने की अपील की गई थी। सरकार के मुताबिक, इसके बाद बड़ी संख्या में लोग वहां पहुंचे और स्थिति हिंसक हो गई। अभियोजन ने हिंसा के बाद सामने आए वीडियो का भी जिक्र किया, जिसमें तौकीर रजा द्वारा लोगों को धन्यवाद देने और कथित तौर पर उनके कृत्यों की सराहना करने का दावा किया गया।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने ‘सर तन से जुदा’ जैसे नारे को लेकर अहम टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि ऐसे नारे को सामान्य धार्मिक उद्घोषों के साथ रखकर नहीं देखा जा सकता। कोर्ट ने ‘अल्लाहु अकबर’, ‘जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’, ‘जय श्री राम’ और ‘हर-हर महादेव’ जैसे धार्मिक नारों का उदाहरण देते हुए कहा कि इनका स्वरूप अलग है। इसके विपरीत किसी व्यक्ति का सिर काटने की बात करने वाला नारा सीधे तौर पर हिंसा और धमकी का संदेश देता है। अदालत की टिप्पणी का केंद्र यही रहा कि धार्मिक आस्था की अभिव्यक्ति और हिंसा के लिए उकसाने वाली भाषा के बीच स्पष्ट अंतर है। कानून-व्यवस्था को चुनौती देने वाले ऐसे कृत्यों को सामान्य धार्मिक गतिविधि बताकर उचित नहीं ठहराया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी देखा कि शुक्रवार की नमाज के बाद लोगों को इस्लामिया इंटर कॉलेज के मैदान में एकत्र होने के लिए बुलाया गया था और इसके लिए प्रशासन से अनुमति नहीं ली गई थी। अदालत के सामने अभियोजन ने दावा किया कि इसी जुटान के बाद हालात तेजी से बिगड़े। पुलिस के मुताबिक, भीड़ को नियंत्रित करने की कोशिश के दौरान पथराव, पेट्रोल बम और फायरिंग जैसी घटनाएं हुईं। इससे पुलिसकर्मियों के घायल होने के साथ-साथ सार्वजनिक संपत्ति को भी नुकसान पहुंचा।

इन सभी परिस्थितियों और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री को देखते हुए हाईकोर्ट ने तौकीर रजा खान और डॉ. नफीस को जमानत देने से इनकार कर दिया। हालांकि, इसी मामले में अदालत ने कुछ अन्य आरोपियों की जमानत अर्जी स्वीकार कर ली। हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद बरेली हिंसा मामले में तौकीर रजा की मुश्किलें फिलहाल बनी हुई हैं। मामले की आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी और आरोपों पर अंतिम फैसला ट्रायल कोर्ट में साक्ष्यों के आधार पर होगा।

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