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पेट्रोलियम मंत्रालय के मुताबिक, पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी से पहले तेल कंपनियों को हर दिन करीब 1000 करोड़ रुपये का घाटा हो रहा था। कीमतों में संशोधन के बाद यह नुकसान घटकर लगभग 600 करोड़ रुपये से थोड़ा कम रह गया है। मिडिल ईस्ट में पिछले लगभग 87 दिनों से जारी तनाव का असर भारत के तेल और गैस आयात पर साफ दिखाई दे रहा है। इसके चलते देश का आयात खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है। पिछले 11 दिनों में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में चार बार बढ़ोतरी के बावजूद तेल कंपनियों को अभी भी भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है, हालांकि घाटा पहले की तुलना में कुछ कम हुआ है। पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा के अनुसार, कीमतों में बढ़ोतरी से पहले तेल कंपनियों को रोजाना करीब 1000 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा था, जो अब घटकर 600 करोड़ रुपये से थोड़ा कम रह गया है। इसमें पेट्रोल, डीजल और एलपीजी के आयात खर्च शामिल हैं। दरअसल, मिडिल ईस्ट संकट का असर भारत की तेल और गैस आपूर्ति पर गहराता जा रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए होने वाली आवाजाही बाधित होने से भारत के करीब 40% कच्चे तेल, लगभग 50% एलएनजी और 90% एलपीजी आयात पर असर पड़ा है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें ऊंची बनी हुई हैं। पेट्रोलियम मंत्रालय की Petroleum Planning and Analysis Cell (PPAC) की 25 मई 2026 को जारी रिपोर्ट के अनुसार, मध्यपूर्व में जारी युद्ध का सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा है। फरवरी 2026 में भारतीय बास्केट क्रूड की कीमत जहां 69.01 डॉलर प्रति बैरल थी, वहीं 22 मई 2026 तक यह बढ़कर 106.26 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। इस तरह कुछ ही महीनों में कीमतों में 37.25 डॉलर प्रति बैरल यानी करीब 53.97% की तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि मई के पहले 22 दिनों में भी कच्चे तेल की कीमत 107.84 डॉलर प्रति बैरल के उच्च स्तर पर बनी रही। भारत अपनी जरूरत का 85% से अधिक कच्चा तेल और लगभग 60% एलपीजी अंतरराष्ट्रीय बाजार से आयात करता है। इनमें से करीब 40% कच्चा तेल और 90% एलपीजी की आपूर्ति होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते होती है। लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के चलते होर्मुज मार्ग पर जहाजों की आवाजाही बाधित हुई है, जिससे भारत के आयात पर असर पड़ा है और तेल खरीद का कुल खर्च करीब 60% तक बढ़ गया है।

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