उत्तर प्रदेश में पंचायत ग्राम स्तर पर सामुदायिक व्यवस्था जारी रहेगी और सरकार ने ग्राम प्रधानों को पद की भूमिका तय करने का निर्णय लिया है। इस चरण को आगामी चयन से सबसे पहले देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि योगी आदित्यनाथ सरकार ने यह फैसला 2027 के चुनाव से पहले एक अहम लक्ष्य के तौर पर लिया है। इसके अंतर्गत संस्था की जगह स्थानीय स्तर पर प्रधानों को अधिक जिम्मेदारी ग्रामीण प्रशासन को नई दिशा देने की कोशिश की गई है। अफसरों की कारस्तानी को समझते हुए इस बार योगी सरकार ने छह माह के लिए गांव की जिम्मेदारी प्रधान को ही प्रशासक के रूप में सौंप दी। अब इस फैसले के राजनीतिक निहितार्थ निकाले जा रहे हैं। माना जा रहा है कि सरकार ने प्रधानों को साधकर बड़ा चुनावी दांव खेला है। दीन दयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के राजनीति विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर एवं राजनीतिक विश्लेषक अमित मिश्रा कहते हैं, सरकार के इस फैसले का बहुत ही सकारात्मक असर गांवों में होगा। गांवों में चलने वाली योजनाओं की गति मिलेगी और बजट खर्च करने में किसी प्रकार की बाधा नहीं आएगी।
भारतीय जनता पार्टी को राजनीतिक लाभ मिल सकता है, रणनीति से मजबूती मिल सकती है
पिछले कार्यकाल में कई पंचायतों में विकास कार्यों के लिए मिले बजट के इस्तेमाल को लेकर अनियमितताओं और धन के दुरुपयोग की शिकायतें सामने आई थीं। वहीं कुछ जगहों पर आवंटित राशि का सही तरीके से उपयोग भी नहीं हो पाया, जिससे सरकार की छवि पर असर पड़ा। अब अगर ग्राम प्रधानों को प्रशासक की भूमिका में रखकर उन्हें योजनाओं को सीधे लागू कराने की जिम्मेदारी दी जाती है, तो इससे विकास कार्यों में तेजी आने की संभावना है। ऐसा माना जा रहा है कि इसका राजनीतिक लाभ आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी को मिल सकता है।


